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'फ्रांस की तरह भारत में भी हो रहे प्रयास': विजयादशमी पर भागवत का बड़ा बयान, कहा- राजनीति से प्रेरित आंदोलन गलत

Tue, 20 Oct 2026 09:17 AM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी पर कहा कि आपसी विभाजन ने भारत को कमजोर किया। उन्होंने संत रविदास के सामाजिक समरसता के संदेश को याद किया। उन्होंने कहा कि दुनिया देख रही है कि फ्रांस और अल्बानिया में क्या हो रहा है? लोकतंत्र में आंदोलन स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समाधान होना चाहिए। 
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मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजन किया। उन्होंने नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इसके साथ ही अपने संबोधन में कहा कि जब हम हम विभाजित हुए तो कमजोर हो गए। 

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आरएसएस प्रमुख ने क्या कहा? 
विजयादशमी उत्सव पर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, 'पिछले एक साल में शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। आज हम विजयादशमी मनाने के लिए यहां एकत्रित हुए हैं। इस वर्ष संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती है। उस दौर में जब हमारा देश विदेशी आक्रमणकारियों के हमलों से जूझ रहा था, जब वे यहां 'स्वधर्म' का पालन करने वालों पर अत्याचार कर रहे थे और चारों ओर भय का माहौल था, तब संत रविदास ने 'स्वधर्म निष्ठा', सामाजिक समरसता और भक्ति का संदेश फैलाया। उन्होंने अपने जीवन के उदाहरण से उस समय के समाज को सांत्वना दी, उनका मनोबल बढ़ाया और उनके गुणों को बनाए रखा। 

'बंटने की वजह से कमजोर हुए'
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, 'यह लचीलापन भी इसी 'सनातन' दृष्टिकोण का परिणाम है। जब हमने इस भावना को समझा और अपनाया। जब यह भावना हमारी भाषा, जाति, संप्रदाय या समुदाय के प्रति हमारी स्वाभाविक भावनाओं से भी ऊपर रही, जब भावनात्मक एकता और भारतीय राष्ट्रीयता की यह भावना सर्वोपरि रही। तब हम दुनिया भर में हर लिहाज से आदर्श थे। जब हम इसे भूल गए, तो हम एक-दूसरे के साथ अपने जुड़ाव और अपनेपन की भावना को भी भूल गए, और हम बंट गए। नतीजतन, हम कमजोर हो गए। जब हम कमजोर हुए, तो मन में डर बैठ गया; हम दुनिया से डरने लगे और चिंता करने लगे कि हम बच पाएंगे या नहीं। एक कमजोर व्यक्ति खुद को दीवारों के भीतर सीमित कर लेता है, और ठीक उसी तरह, हमने भी खुद को सीमित कर लिया। '
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'दुनिया का ध्यान भारत की ओर गया है'
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, 'दुनिया का ध्यान भारत की ओर गया है। जैसे-जैसे देश का कद बढ़ रहा है और भारत तरक्की कर रहा है, वैसे-वैसे भारत को लेकर लोगों की जिज्ञासा भी बढ़ रही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी जीवनशैली जो भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोग पर आधारित है, और जिसका दृष्टिकोण एकांगी (सीमित) है। यह उनके जीवन में कई समस्याएं पैदा कर दी हैं। भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद, वे इन समस्याओं की चिंता से घिरे हुए हैं। उनके पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं कि दुनिया की इतनी विशाल विविधता को एक साथ कैसे संभाला जाए, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, अलग-अलग लोगों के साथ अपनापन कैसे रखा जाए, या फिर पारिवारिक जीवन के पतन और नई पीढ़ी में मूल्यों के क्षरण को कैसे रोका जाए।'

दुनिया में हो रहे प्रदर्शन पर क्या बोले? 
उन्होंने कहा आगे कि पश्चिम से एक आंधी चली है। इससे बचकर रहना चाहिए। दुनिया देख रही है फ्रांस और अल्बानिया में क्या हो रहा है। भारत में भी ऐसे प्रयास चल रहे हैं। भारत में गलत आचरण नहीं चलना चाहिए। प्रजातंत्र में आंदोलन होना स्वाभाविक है। लेकिन समाज से समाधान का रास्ता निकलेगा। आंदोलन का मकसद समाधान होना चाहिए। सस्ती लोकप्रियता से उकसाने वाले लोग बैठे हैं।  सत्ता परिवर्तन से स्थिति बदल जाएगी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। न अतीत में हुआ है, न आज हो रहा है। जो लोग अपने स्वार्थों की पूर्ति करते हैं, उनके पास हमेशा से अपने कठपुतली नेता होते हैं, जिन्हें वे प्रभावित करते हैं। ये कार्रवाइयां विश्वभर में कैसे अंजाम दी जा रही हैं? भारत का उदय ऐसी कार्रवाइयों पर रोक लगा देगा, और इसलिए भारत ही उनका अंतिम लक्ष्य है। 

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि भारत को कमजोर करने की कोशिश करने वाली ताकतें देश, हिंदुओं और आरएसएस को तोड़ने की कोशिश कर रही हैं और उन्हें राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित लोगों का समर्थन मिल रहा है। भागवत ने कहा,'ये शैतानी ताकतें यह जानती हैं, और इसीलिए भारत उनका निशाना है। वे भारत, हिंदुओं और संघ को तोड़ने के तरीके ढूंढते हैं और इसे 'विघटन' कहते हैं। उन्हें समर्थन भी मिलता है। उनके जैसे विचारों वाले लोग, साथ ही सत्ता की लालसा और विवेकहीनता से प्रेरित महत्वाकांक्षी नेता, उनके लिए उपलब्ध हो जाते हैं।'

भारत के लोगों को लेकर क्या कहा? 
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, 'हम भारत के लोग एक हैं, और हमारी एकता स्वाभाविक है, यह दिल से आती है। यह कोई सौदा या अनुबंध नहीं है। यह ऐसा नहीं है कि 'अगर हमें भारत में कुछ मिलेगा, तभी हम भारत के हैं; वरना नहीं'। यह बिना किसी शर्त के है। भारत हमें कुछ दे या न दे, हमारा सब कुछ भारत का ही है। जब हम संघ में इस हिंदू भावना को मजबूत करने के लिए एक संगठित और सशक्त हिंदू समाज बनाने की बात करते हैं, तो इसका मतलब किसी भी तरह से अन्य धर्मों के प्रति आपसी सम्मान या राष्ट्रीय एकता का विरोध करना नहीं है। क्योंकि हिंदू सोच और चरित्र स्वभाव से ही सबको साथ लेकर चलने वाले हैं, इसलिए यह काम हमारी भावनात्मक एकता, सद्भावना और नैतिक अखंडता को बढ़ावा देता है। 

स्मित मच्छार पर क्या बोले? 
इसके बाद उन्होंने कहा कि 'इसी संस्कार से प्रेरित होकर, कैप्टन स्मित मच्छार ने हाल ही में जो किया, वह स्वाभाविक था। ऐसी स्थिति में क्या करना है, इसके लिए कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। बस उस परीक्षा की घड़ी में उनके भीतर की परंपराएं और संस्कार सामने आ गए।'

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