2020 में 18,12,345 और 2021 में 21,43,814 मरीज मिले थे। मंत्रालय का मानना है कि इस कामयाबी में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का सहयोग भी रहा है। निजी क्षेत्र ने विशेष रूप से अपने 2019 के लक्ष्य को पार कर लिया है।
पहली बार देश में टीबी के रिकाॅर्ड मरीजों तक पहुंचने में सरकार कामयाब रही है। बीते एक ही साल में सरकार ने 24.22 लाख नए मरीजों की पहचान की है जिनमें से 30 फीसदी से ज्यादा मरीजों की सूचना निजी अस्पतालों के जरिये मिली है। वर्ष 2019 के बाद नए मरीजों की संख्या सबसे अधिक है क्योंकि कोरोना महामारी के चलते 2020 और 2021 में टीबी अभियान सबसे अधिक प्रभावित रहा था। आगामी 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस को लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम पर एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें बताया गया है कि 2019 में 24,00,429 मरीजों को पंजीकृत किया गया जबकि 2022 में यह संख्या 24,22,891 दर्ज की गई जो अब तक सबसे अधिक आंकड़ा है।
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2020 में 18,12,345 और 2021 में 21,43,814 मरीज मिले थे। मंत्रालय का मानना है कि इस कामयाबी में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का सहयोग भी रहा है। निजी क्षेत्र ने विशेष रूप से अपने 2019 के लक्ष्य को पार कर लिया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान में जिला स्तर पर काफी सहयोग मिल रहा है। 2012 में 14 लाख से अधिक मरीज मिले थे जो 2019 में 24 लाख तक पहुंचे। यानी इन सात साल में टीबी के नए मरीजों की संख्या में 63% की वृद्धि हुई जबकि 2020 से 2022 के बीच यह बढ़ोतरी 40% से अधिक दर्ज की गई।
सभी मरीजों की सूचना नहीं दे रहे प्राइवेट अस्पताल
आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दो में से एक रोगी (56.1%) टीबी के लक्षण होने पर इलाज के लिए निजी अस्पताल पहुंचा लेकिन चार में से केवल एक टीबी रोगी की सूचना निजी अस्पतालों से सरकार तक पहुंची है। इसी तरह महाराष्ट्र में 10 में से लगभग 6 मरीज (65.9%) निजी क्षेत्र में जाते हैं, लेकिन यहां केवल चार (43%) मरीजों की सूचना दी जा रही है।
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हर राज्य में प्रभावी नहीं सक्रिय रोगियों के लिए अभियान
टीबी मरीजों की पहचान के लिए राज्य सरकारें सक्रिय मामलों की तलाश के लिए अभियान चला रही हैं। 2017 से 2021 के बीच 2.23 करोड़ लोगों की जांच की गई। बावजूद इसके टीबी मामले की पहचान प्रति एक लाख आबादी पर 33 है जो राष्ट्रीय प्रसार प्रति एक लाख की आबादी में 312 टीबी रोगी की तुलना में बहुत कम है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में यह स्थिति है। छत्तीसगढ़ में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 451 मामले बहुत अधिक हैं। जबकि सरकार के एसीएफ अभियान में प्रति एक लाख जनसंख्या पर केवल आठ टीबी मामले थे।