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नवाज शरीफ के हटने से इमरान खान को कितना फायदा?

Fri, 04 Aug 2017 06:25 AM IST
हारुन रशीद, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
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imran khan
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इमरान खान ने पिछले 4 साल नवाज शरीफ की सरकार को जकड़े रखा और लगातार दबाव बनाए रखा। नवाज के जाने के बाद अब इमरान खान के विरोधियों को लगता है कि उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाए।
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इमरान की मुश्किल यह है कि उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक फॉरेन फंडिंग का केस चल रहा है। उनके ऊपर अपनी संपत्ति छिपाने का भी आरोप है। इलेक्शन कमीशन में उनकी डिस्क्वॉलीफिकेशन का एक केस सुना जा रहा है।

इसके अलावा हाल ही में उनकी पार्टी पीटीआई की ही नेता आएशा गुलालइ वजीर ने उनके ऊपर अब तक के सबसे संगीन आरोप लगाए हैं। ये आरोप करप्शन के भी हैं और महिलाओं के प्रति उनके रवैये पर भी सवाल खड़े करते हैं।
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इमरान को आराम से नहीं बैठने देंगे विरोधी

nawaz sharif
लगता है कि इमरान के विरोधी अब उन्हें आराम से बैठने नहीं देंगे, ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने नवाज शरीफ को नहीं बैठने दिया था। कहते हैं कि राजनीति में सही और गलत कुछ नहीं होता। ऐसे में लगता है कि आगे चलकर पर्सनल अटैक ज्यादा हो सकते हैं।

इमरान खान को लेकर चर्चा यही है कि करप्शन के बजाय उन निजी मामलों को लेकर उन्हें घेरा जा सकता है जिनके बारे में उन्होंने बात नहीं की है। नवाज शरीफ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा हटाए जाने के बाद इमरान खान का समर्थन बढ़ा है।

लोग साथ तो थे मगर उनमें यह शंका पैदा हो रही थी कि इमरान के साथ कब तक चला जाए क्योंकि वह हमेशा करप्शन की ही बात करते थे। अब शायद लोग फिर उनका समर्थन कर सकते हैं।

मुख्य पार्टियों के बीच बढ़ेगी तल्खी

pakistan

पाकिस्तान में चुनाव अगले साल होंगे और सत्ताधारी पार्टी ने भी साफ किया है वह जल्दी चुनाव कराने के हक में नहीं हैं। ऐसे में आने वाले 10 महीनों में यह देखना अहम होगा कि दोनों मुख्य पार्टियां क्या करती हैं और एक-दूसरे से कैसे डील करती हैं। दोनों के बीच तल्खी बढ़ेगी।

दोनों पार्टियों की ही पूरी कोशिश होगी कि जितना मुमकिन हो सके, एक-दूसरे के कपड़े भी उतार दें। राजनीति और गंदी होगी। पाकिस्तान की राजनीति में रोज नए धमाके होते रहते हैं। इसलिए यकीन के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता कि इमरान खान को अभी जो थोड़ा-बहुत फायदा मिला है, वह चुनाव तक बरकरार रहेगा या नहीं।


चुनाव का मुद्दा होगा अहम
यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि 8-10 महीनों बाद वोटर जब वोट डालने जाएगा तो वह शरीफ के खिलाफ वोट देगा फिर विकास को लेकर। खैबर पख्तुनख्वां में तो इमरान की पार्टी की सरकार रही है। वहां उन्होंने क्या काम किया है, जनता उसे देखकर भी वोट देगी।

नवाज शरीफ द्वारा लाहौर और पंजाब के अन्य इलाकों में चलाए जा रहे प्रोजेक्ट भी तब तक पूरे हो चुके होंगे। वह भी उन्हीं की बुनियाद पर इलेक्शन मजबूती से जीत पाएंगे। ऐसे में उसी वक्त कहा जा सकेगा कि इलेक्शन नवाज के करप्शन के मुद्दे पर लड़ा जाएगा या फिर विकास को लेकर।

अगर चुनाव करप्शन पर होगा तो इमरान को फायदा हो सकता है। वहीं अगर विकास के मुद्दे पर हुआ तो नवाज फायदे में रह सकते हैं क्योंकि वे ऐसे प्रोजेक्ट ज्यादा कर रहे हैं जो नजर आते हैं।
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इमरान को बनानी होगी आगे की रणनीति

Imran Khan
भले ही इमरान की लोकप्रियता में इजाफा हुआ है मगर उन्हें सोचना होगा कि आने वाले 10 महीनों में उन्हें क्या करना है- क्या मुस्लिम लीग (नवाज) की सरकार पर इसी तरह प्रेशर बनाए रखना है या नहीं।

वह कह रहे हैं कि अंतरिम प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी भी करप्शन में शामिल हैं। तो क्या आने वाले 8-10 महीनों में भी इसी करप्शन का राग आलापते हुए वह अपनी लोकप्रियता बरकरार रख पाएंगे?

वैसे यह काम मुश्किल है क्योंकि यह बात अदालतों पर निर्भर करती है। अगर इलेक्शन से एक-दो महीने पहले कोर्ट के किसी फैसले से सरकार को नुकसान होता है तो उसका सीधा फायदा इमरान ख़ान को होगा।


तब बात अलग होगी। वरना नए प्रधानमंत्री अगर कामयाबी से सरकार चलाते हैं, प्रोजेक्ट लाते हैं, नौकरियां देते हैं और इकॉनमी को बेहतर करते हैं तो इमरान के लिए इलेक्शन जीतना मुश्किल होगा।


इमरान के लिए लोकप्रियता बनाए रखना मुश्किल
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए इमरान ख़ान ने सरकार पर दबाव बनाया था। वह जानते थे कि अगर नवाज इलेक्शन करवाते हैं तो उनके लिए जीतना मुश्किल होगा क्योंकि वह सरकार में हैं, उनके पास फंड हैं, डिवेलपमेंट स्कीम्स हैं और पंजाब को भी उन्होंने खुश रखा हुआ है।

इसलिए इमरान के लिए जरूरी था कि नवाज शरीफ को गिराएं। ऐसा हुआ भी मगर शायद वक्त से पहले हो गया। इमरान को लगता था कि शायद नवाज अपनी सरकार गिरने के बाद चुनाव करवाएंगे और उनकी पार्टी आसानी से जीत जाएगी। मगर ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया।

यही वजह है कि इमरान के लिए अपनी लोकप्रियता बरकरार रखना मुश्किल होगा। मुद्दे बहुत होते हैं, बयान बहुत होते हैं मगर लोग यह देखना चाहते हैं कि जमीन पर क्या बदलाव आए हैं। विकास देखकर ही लोग वोट करते हैं।
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