हरियाणा और महाराष्ट्र के दो कांग्रेसी नेताओं ने चुनाव के ऐन मौके पर पार्टी छोड़ने की धमकी दे दी है। एक सप्ताह पहले त्रिपुरा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष रहे प्रद्योत देब बर्मन भी पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। थोड़ा और पीछे चलते हैं, तो गत माह झारखंड कांग्रेस के प्रमुख अजोय कुमार ने पार्टी छोड़ दी थी। मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा भी त्यागपत्र दे चुके हैं। हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर और मुंबई कांग्रेस के प्रमुख रहे संजय निरुपम, दोनों ने एक ही बात कही है कि कांग्रेस पार्टी में अब राहुल गांधी के समर्थकों को निशाना बनाया जा रहा है।
लोकसभा चुनाव से पहले और उसके बाद पार्टी में बड़े स्तर पर नए और पुराने चेहरों की टकराहट सामने आई थी। यहां तक कि कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र तैयार करने से लेकर प्रचार की रणनीति और चुनावी टैग लाइन तय करने के दौरान भी युवा नेता यानी राहुल समर्थक और पुराने नेता मतलब सोनिया गांधी के साथ चलने वाले कांग्रेसियों के बीच मतभेद उभर कर सामने आ गए थे। राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद एक बार फिर दो पीढ़ियों के बीच टकराव देखने को मिला। कभी कोई युवा नेता किसी मसले पर भाजपा के समर्थन में बयान दे देता, तो दूसरा नेता उसके विरोध में खड़ा हो जाता।
बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेकर एनआरसी और अनुच्छेद-370 तक कांग्रेस के भीतर अलग-अलग सुर सुनाई दिए। त्रिपुरा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष प्रद्योत देब बर्मन ने एनआरसी को लेकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि यहां पर एनआरसी बहुत जरुरी है। हमने इसके नाम पर लोगों को पार्टी के साथ जोड़ा है। अब कांग्रेस पार्टी इसके खिलाफ स्टैंड ले रही है, यह पूरी तरह गलत है।
उन्होंने साफतौर पर कह दिया कि कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के समर्थकों यानी युवा चेहरों को बारी-बारी से किनारे किया जा रहा है या उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि वे खुद ही पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएं। असल बात यह है कि पुराने कांग्रेसी, युवा चेहरों के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। उन्हें युवा पीढ़ी के कामकाज का तरीका पसंद नहीं है।
अशोक तंवर, संजय निरुपम, मिलिंद देवड़ा, देब बर्मन और अजोय कुमार के बयानों से दो बातें उभर कर सामने आई हैं। पहली, राहुल गांधी की तरफ से नियुक्त या उनके साथ नई सोच से काम करने वाले नेताओं को धीरे-धीरे साइड किया जा रहा है। दूसरी, इन सभी नेताओं ने कांग्रेस पार्टी के महासचिवों की कार्यशैली पर कई सवाल उठाए हैं। अशोक तंवर का कहना है कि राहुल गांधी जब पार्टी अध्यक्ष बने, तो महासचिवों के काम करने का तौर तरीका भी बदल गया था। सर्वे और ग्राउंड रिपोर्ट को तव्वजो मिलने लगी थी। किसी को टिकट देना होता था, तो वह भी सर्वे के आधार पर देने का नियम तय हुआ था।
लेकिन जब से राहुल हटे हैं, वे सब नियम भी खत्म हो गए हैं। तंवर के मुताबिक कहने के लिए हरियाणा चुनाव में कई तरह की कमेटियां बना दी गईं और इनके अनुसार सारी तैयारी होनी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। किसी कमेटी की कोई सिफारिश नहीं मानी गई। सर्वे रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया गया। टिकट वितरण में केवल पार्टी महासचिव और पूर्व सीएम की चली। इसी तरह संजय निरुपम ने कहा कि पार्टी में महासचिव पद पर बैठे लोगों को कामकाज नहीं आता है। सोनिया गांधी के आसपास जो लोग हैं, उनका एक ही मकसद है कि राहुल के समर्थकों को इधर-उधर कर दिया जाए।