राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में हाशिम अंसारी कांग्रेस को दोषी मानते थे। वहीं, मुस्लिम नेताओं के भी आलोचक थे। सन 1961 में जब सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मुकदमा किया था तब उसमें हाशिम पहले मुद्दई बने। पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 में इमरजेंसी के दौरान उन्हें भी 8 महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखा गया था। इसके लिए उन्होंने कभी कांग्रेस को माफ नहीं किया।
दंगाइयों के हमले में हिंदुओं ने बचाया
हाशिम का जन्म 1921 में हुआ था। जब वह 11 साल के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। दर्जा दो तक पढ़े हाशिम के परिवार की आमदनी का जरिया सिलाई था। 6 दिसंबर 1992 में शहर के बाहर से आए लोगों ने उनका घर जला दिया था। लेकिन अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया। सरकार से उन्हें जो मुआवजा मिला उन्होंने अपना घर दोबारा बनवाया और एक एंबेसडर कार खरीदी थी। उनका बेटा मोहम्मद इकबाल इसी एंबेसडर को टैक्सी के तौर पर हिंदू तीर्थयात्रियों को अयोध्या के मंदिरों का दर्शन कराते हैं।
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के पक्षकार महंत परमहंस रामचंद्र दास और हाशिम अंसारी की दोस्ती किसी पहेली से कम नहीं है। जमीन की दावेदारी के विवाद को लेकर भले ही दोनों कोर्ट में 1949 से एक दूसरे के सामने रहे, लेकिन कोर्ट के बाहर उनकी अनूठी दोस्ती अपने आप में सौहार्द की मिसाल थी।
अपने हक की लड़ाई में उन्होंने कभी अयोध्या का आपसी सौहार्द खराब नहीं होने दिया यहां तक प्रदेश में कई बार इस मुद्दे पर तनाव हुआ लेकिन तब भी दोनों शहर का सौहार्द बनाए रखने में कामयाब रहे। विवादित स्थल पर वाद दायर करने वाले अंसारी पहले व्यक्ति थे। महंत परमहंस रामचंद्र दास से हाशिम की आखिरी दम तक गहरी दोस्ती रही।
परमहंस और हाशिम तो एक ही तांगे से मुकदमे की पैरवी के लिए साथ-साथ अदालत जाते और दिनभर की जिरह के बाद हंसते-बोलते एक ही सवारी से घर वापस आते थे। करीब 6 दशक तक यूं ही उन्होंने दोस्ती निभाई। साल 2003 में परमहंस के देहांत की खबर जब हाशिम को मिली तो वह पूरी रात उनके पास रहे। दूसरे दिन अंतिम संस्कार के बाद ही अपने घर आए।
परमहंस रामचंद्र दास के दुनिया में न रहने के बाद हाशिम ने हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञान दास से मिलकर दोस्ती की रस्म आगे बढ़ाई और सुलह की कोशिशों को कायम रखा। 2016 में जब 96 साल की उम्र में हाशिम अंसारी का इंतकाल हुआ तो महंत ज्ञानदास ने कहा कि मैंने अपना मित्र खो दिया है। हाशिम अंसारी की इसी परंपरा को उनके बेटे इकबाल अंसारी ने भी आगे बढ़ाया। इसी साल महंत धर्मदास दिवाली की बधाई देने उनके घर पहुंचे।