देश में बीफ बैन को लेकर उत्तर पूर्व, बंगाल से लेकर के केरल और तमिलनाडु तक बवाल मचा हुआ है। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार के बाद से इस बात पर बहस काफी बढ़ गई है। विवाद तब और बढ़ गया जब केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय ने पशु कटान पर नया नोटिफिकेशन जारी कर दिया। जिसमें स्लाटर हाउस में गाय भैंस सहित कई पशुओं पर बैन और पशु मंडियों में कटान के लिए पशुओं की बिक्री पर रोक की बात कही गई थी।
इस नोटिफिकेशन के बाद देशभर में बवाल मच गया। कई संगठनों के साथ राजनीतिक दलों ने भी सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए खुलकर मोर्चा खोल दिया। केरल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीच सड़क गोवंश काटकर विरोध जताया तो चेन्नई आईआईटी में छात्रों ने बीफ पार्टी मनाई। हालांकि इस बीच सरकार की सफाई भी सामने आ गई, जिसमें साफ किया गया कि वह स्लॉटर हाउस पर प्रतिबंध लगाने नहीं जा रही है। हालांकि इस सारे विवाद के बीच बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उस अघोषित एजेंडे पर काम कर रही है जिसमें बीफ बैन के साथ पशु कटान पर प्रतिबंध की वकालत की गई है।
दादरी से शुरू हुई थी विवाद की शुरुआत
बीफ पर मचे विवाद की शुरूआत साल 2015 में दिल्ली से लगते नोएडा के दादरी तहसील के बिसरख गांव से हुई थी। जहां गांव निवासी अखलाक के घर पर गोमांस पकाए जाने के संदेह में कुछ कथित गो रक्षकों ने अखलाक और उसके बेटे को पीट पीटकर मरणासन्न कर दिया था। इस मुद्दे ने ऐसा तूल पकड़ा कि देश भर में इसके विरोध में तीखी प्रतिक्रिया हुई। कुछ लेखकों ने इसके विरोध में अपने पुरस्कार वापिस किए तो अन्य ने अपने अपने तरीके से इस पर विरोध जताया। हालांकि उस समय की अखिलेश सरकार ने मामले में काफी संख्या में आरोपियों को जेल भेजा था। लेकिन शायद बीफ विवाद को खत्म करने के लिए ये नाकाफी था।
केंद्र के नए कदम ने भड़काया आक्रोश
अभी देश के 18 राज्यों में गोवंश के स्लॉटर पर बैन लगा हुआ है। बावजूद इसके सरकार के नए नियम (पर्यावरण मंत्रालय के नोटिफिकेशन) से लोगों में ज्यादा गुस्सा दिख रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज भी देश में रहने वाले गरीब मुसलमानों, दलितों और ईसाईयों के लिए बीफ खाना प्रोटीन पाने का सबसे सस्ता और सुलभ माध्यम है। सदियों से रहने वाले दलित, मुसलमानों और ईसाईयों के यहां बीफ खाना उनके दैनिक भोजन का हिस्सा है।
बीफ बन गया है हिंदु बनाम मुस्लिम मुद्दा
मोदी सरकार में बीफ खाना या नहीं खाना हिंदु बनाम मुस्लिम मुद्दा बन गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार एक तरह से आरएसएस के एजेंडे को लागू करना चाहती है। आरएसएस का एजेंडा देश को पूरी तरह से शाकाहारी बनाने का है। इस एजेंडे को लागू करवाने के लिए जहां गौरक्षक काफी लंबे समय से प्रयास कर रहे थे। अब केंद्र में मोदी और यूपी में योगी सरकार के आने के बाद इस मुद्दे को काफी हवा मिली है। हालांकि सरकार के आंकड़ों के हिसाब से देश के 70 फीसदी लोग नॉन वेजेटेरियन हैं तो सवाल उठता है कि क्या केंद्र सरकार आरएसएस के इस एजेंडे को लागू करने में पूरी तरह से सफल हो सकेगी?