बीते 8 नवंबर को कालेधन पर नकेल कसने के लिए 500 और 1000 रुपये के नोटबंदी की घोषणा होते ही देशभर में उथल-पुथल मच गई। तब से लेकर अब तक सरकारी खजाने में करीब 11 लाख करोड़ रूपये के पुराने नोट जमा हो चुके हैं। वहीं, ढाई लाख करोड़ रुपये के नए नोट बैंक से निकल भी चुके हैं। करीब एक तिहाई रकम निकलने के बावजूद आम आदमी अब भी बैंक में पैसे के लिए कतार में लगा है।
आखिरकार पैसा गया कहां। क्या यह पैसा बीमारू कंपनियों में निवेश किया जा रहा है या फिर बैंक ही कालाधन को सफेद बनाने का जरिया बन चुके हैं। जानकार कहते हैं कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कुछ ऐसा ही हो रहा है। कालेधन के खिलाफ केंद्र सरकार के स्ट्राइक के बाद यह मामला बड़ा संवेदनशील हो चुका है। इसलिए चार्टर्ड अकाउंटेंट से लेकर व्यवसायी, बैंकर्स कोई भी कालेधन पर बात करने को राजी नहीं है।
आर्थिक जानकारों की मानें तो मुंबई के धनकुबेर जन धन खाते के अलावा कारखानों और कर्मचारियों पर कालाधन खर्च कर रहे हैं। कर्मचारियों को जहां एक साल से लेकर दो साल का अग्रिम वेतन भुगतान किया जा रहा हैं वहीं, बीमारू कंपनियों में निवेश कर भविष्य में उसे प्रोफिट में लाने के इंतजाम भी किए जा रहे हैं। कर्मचारियों को अग्रिम भुगतान करने से पहले सौ रुपये के स्टांप पेपर पर लिखवाया जा रहा है फिर भी यह काफी जोखिम भरा है। आयकर एक्ट की धारा के तहत कोई भी फर्म 20 हजार रुपये से ज्यादा लोन कैश में नहीं दे सकती।
लेकिन इसकी चिंता कौन करता है। मुंबई पश्चिम उपनगर के एक उद्योग समूह (जिसके छह हजार कर्मचारी बताए जाते हैं) ने अपने कर्मचारियों को दो साल की सेलरी का अग्रिम भुगतान कर दिया है। इसमें ए ग्रेड के अधिकारी से लेकर बी,सी, और डी ग्रेड जिसमें चौकीदार भी शामिल हैं। ऐसे कर्मचारियों की तो मानो लॉटरी लग गई है।