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SC: बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन के लिए समिति गठित करेगा सुप्रीम कोर्ट, यूपी सरकार के अध्यादेश पर उठाए सवाल

Mon, 04 Aug 2025 07:36 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 जारी करने की जल्दबाजी पर सवाल उठाया।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मथुरा के वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक अंतरिम समिति का गठन करने को कहा है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने के लिए श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025 जारी करने की जल्दबाजी पर सवाल उठाया है। यह भी कहा कि वह श्री बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर के विकास के लिए यूपी सरकार को मंदिर ट्रस्ट के धन के उपयोग के लिए 15 मई को दी गई अपनी मंजूरी को स्थगित रखेगा।

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मंदिर का प्रबंधन हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति के अधीन रहेगा
 पीठ ने दीवानी विवाद में यूपी सरकार की ओर से गुप्त तरीके से आवेदन दायर करने के तरीके की निंदा की। आवेदन पर 15 मई को दो किए गए फैसले को वापस लेने का प्रस्ताव रखा। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नेटराज को इस प्रस्ताव पर सरकार के निर्देश प्राप्त करने का समय देते हुए मंगलवार तक मामले की सुनवाई स्थगित कर दी।

सुनवाई के दौरान पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि वह अध्यादेश को चुनौती देने के लिए संबंधित पक्षों को हाईकोर्ट में भेज देगी। इस बीच, मंदिर का प्रबंधन हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति के अधीन रहेगा। इस दौरान परिवार की ओर से पहले की ही तरह मंदिर के अनुष्ठान जारी रहेंगे। पीठ ने यह भी कहा कि कलेक्टर और अन्य अधिकारी भी समिति का हिस्सा हो सकते हैं। न्यायालय ने प्रस्ताव दिया कि क्षेत्र के समग्र विकास के लिए एएसआई को भी समिति से जोड़ा जा सकता है।
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बांके बिहारी मंदिर के पूर्व प्रबंधकों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि अध्यादेश के जरिये गोस्वामियों को हटाकर मंदिर प्रबंधन का दायित्व सरकार के नियंत्रण वाले एक ट्रस्ट को सौंप दिया। सुप्रीम कोर्ट का 15 मई का फैसला पीठ पीछे दिया गया फैसला था, क्योंकि उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत का फैसला दो संप्रदायों के बीच एक निजी विवाद से संबंधित मामले में आया था। राज्य ने निजी विवाद में हस्तक्षेप किया और मंदिर के धन के उपयोग के आदेश प्राप्त किए। दीवान ने यथास्थिति के आदेश पर जोर दिया।

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प्रभावित पक्षों को नोटिस दिए बिना निर्देश जारी करने के तरीके पर पीठ असहमत
इस पर जस्टिस कांत ने राज्य की ओर से पेश हुए एएसजी केएम नटराज से पूछा कि 15 मई के फैसले को कैसे उचित ठहराया जा सकता है जब प्रभावित पक्षों की बात नहीं सुनी गई। एएसजी नटराज ने जवाब दिया कि यह एक सार्वजनिक मंदिर है और जिन लोगों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, उन्हें प्रबंधन समिति का सदस्य नहीं माना जाता।
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हालांकि पीठ ने प्रभावित पक्षों को नोटिस दिए बिना निर्देश जारी करने के तरीके पर अपनी असहमति जताई। पीठ ने कहा कि एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया जा सकता था। यह नो मैन्स लैंड का मामला नहीं था। मंदिर की ओर से किसी की सुनवाई होनी थी। यदि सिविल जज निगरानी कर रहे थे तो सिविल जज को नोटिस जारी किया जा सकता था। उन्होंने पूछा कि राज्य ने मुआवजा देने के बाद कानून के अनुसार भूमि का अधिग्रहण क्यों नहीं किया।

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