इसके बाद अंदाजा लगाया जा रहा था कि टिड्डी का प्रकोप नवंबर तक खत्म हो जाएगा। दिसंबर में इसके आसार भी दिखने लगे क्योंकि अमूमन ऐसा होता है कि भारत में मौसम की तब्दीली होती है। इसलिए टिड्डियां प्रजनन के लिए पाकिस्तान के बलूचिस्तान और ईरान के रेगीस्तान की ओर चली जाती हैं।
इस साल पूरे समय भारत में बेमौसम बरसात और मौसम की बेरुखी रही। इसके अलावा पाकिस्तान सरकार के प्रभावी नियंत्रण कार्यक्रमों के अभाव के कारण प्रजनन के बाद अवयस्क (गुलाबी) टिड्डियों के दल दिसंबर के दूसरे सप्ताह में ही वापस देश में राजस्थान के जैसलमेर और बाड़मेर की ओर से घुसने लगे। यह टिड्डियां ऊंचे पेड़ों पर आकर बैठने लगी। झुंड के झुंड पेड़ों पर मंडराने लगे ।
लिहाजा नियंत्रण अभियान में दवा के छिड़काव के लिए फायर बिग्रेड को शामिल किया गया। इसके अलावा किसानों ने पॉवर ट्रैक्टर छिड़काव यंत्र की मदद से पेड़ों पर ही अवयस्क गुलाबी टिड्डियों को नियंत्रित किया। इसके अलावा सघन अभियान चला कर गुजरात और राजस्थान के रेतीले इलाकों बबूल के घने जंगलों और रेत के टिलों में छिपे टिड्डी दलों को समाप्त किया गया।
इसमें लगभग 3,14,300 लीटर मेलाथियान 96 फीसदी यूएलवी कीटनाशक इस्तेमाल हुआ। जिसकी आपूर्ति हिंदूस्तान इनसेक्टीसाइड लिमिटेड द्वारा की गई। केंद्र सरकार के अनुरोध पर विभिन्न कीटनाशक कंपनियों ने अपने सामाजिक सरोकार के दायित्व (सीएसआर) के तहत किसानों को कीटनाशक उपलब्ध कराए। इसके अलावा सरकार के नियंत्रण काम में बढ़ चढ़ कर सहयोग किया।
जनवरी में वरिष्ठ टिड्डी पूर्वानुमान अधिकारी कीथ क्रसमिन ने 16 से 17 जनवरी तक भारत का दौरा किया। उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट है कि भारत और उसके विभिन्न विभागों के अथक प्रयासों से टिड्डियों के प्रकोप को रोकने में सहायता मिली है। अन्यथा यह टिड्डियां 1950 की तरह उत्तरी भारत से बंग्लादेश में प्रवेश कर जाती और इनका कहर वहां की फसलों पर विनाश की तरह बरसता।