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Karnataka: 'बंगलूरु को दो-तीन साल में नहीं बदला जा सकता', राजधानी की विकास योजना पर बोले डिप्टी सीएम शिवकुमार

Thu, 20 Feb 2025 10:04 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बंगलूरू

सार

बंगलूरू महानगर पालिका (बीबीएमपी) द्वारा सड़क निर्माण पर आयोजित एक कार्यशाला में डिप्टी सीएम ने कहा, बंगलूरु को दो-तीन साल में नहीं बदला जा सकता। यहां तक कि भगवान भी ऐसा नहीं कर सकते। इसे केवल तभी बदला जा सकता है जब उचित योजना बनाई जाए और अच्छी तरह से लागू किया जाए।
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डीके शिवकुमार - फोटो : PTI
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विस्तार
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कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने गुरुवार को बंगलूरू में सड़क परियोजनाओं और हरित क्षेत्रों के विकास की योजना के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उचित सड़कों, फुटपाथों और हरित क्षेत्रों की योजना बनाने में असफल होना बंगलूरु के लिए बहुत बड़ा नुकसान होगा।

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बंगलूरू महानगर पालिका (बीबीएमपी) द्वारा सड़क निर्माण पर आयोजित एक कार्यशाला में डिप्टी सीएम ने कहा, बंगलूरु को दो-तीन साल में नहीं बदला जा सकता। यहां तक कि भगवान भी ऐसा नहीं कर सकते। इसे केवल तभी बदला जा सकता है जब उचित योजना बनाई जाए और अच्छी तरह से लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि यहां जारी की गई हैंडबुक में सड़कों पर पौधे लगाने, खंभे लगाने, मुख्य सड़कों के डिजाइन, छोटी सड़कों के डिजाइन, यातायात अनुशासन, बस स्टैंड के डिजाइन को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए हैं। हम सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में एकरूपता और मानकीकरण चाहते हैं।

डीके शिवकुमार ने कहा कि हमने खुले में लटकी सभी केबलों को हटाने का निर्देश दिया है। बीबीएमपी को उन्हें भूमिगत करने या काटने के लिए कहा है। सरकार लोगों की संपत्ति की सुरक्षा के लिए नई नीतियों पर काम कर रही है। इसकी घोषणा फरवरी के आखिरी सप्ताह में की जाएगी। सुरंग परियोजनाओं को लेकर डिप्टी सीएम ने कहा कि तकनीकी, वित्तीय और अधिग्रहण संबंधी मुद्दों के कारण हम सुरंग परियोजनाओं के लिए निविदाएं नहीं निकाल पाए हैं।  
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उन्होंने सड़कों पर जारी की गई हैंडबुक के महत्व पर जोर दिया। डिप्टी सीएम ने कहा कि सड़कों पर यह पुस्तिका बंगलूरु का भविष्य तय करेगी। हमें मेट्रो स्तंभों को सांस्कृतिक प्रतीकों से सुंदर बनाने जैसे कई सुझाव भी मिले हैं। यह पहले ही कुछ स्थानों पर किया जा चुका है। छात्रों और युवाओं को सुझावों के साथ आगे आते देखना उत्साहजनक है। उन्होंने बंगलूरु के भविष्य को आकार देने के प्रयास का हिस्सा बनने के लिए स्वेच्छा से काम किया है।

कन्नड़ भाषा के लुप्त होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि कन्नड़ गायब नहीं हुई है। मैंने ही कन्नड़ नाम के बोर्डों के लिए 60:40 अनुपात का सुझाव दिया था। अगर इस नियम का कोई उल्लंघन हुआ तो हम कार्रवाई करेंगे।

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