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Shiv Sena: पिता की बनाई पार्टी और चुनाव चिह्न दोनों उद्धव के हाथ से निकले, ठाकरे परिवार का आगे क्या होगा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Fri, 17 Feb 2023 08:39 PM IST

सार

चुनाव आयोग के फैसले के बाद पार्टी के कार्यालयों से लेकर पार्टी से जुड़े सभी संसाधनों को लेकर भी लड़ाई शुरू हो सकती है। शिवसेना भवन को लेकर भी शिंदे गुट अब अपना अधिकार जता सकता है।
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उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और बालासाहेब ठाकरे - फोटो : Amar Ujala

19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया। पार्टी के 57 साल के इतिहास में ठाकरे परिवार को शुक्रवार को सबसे बड़ा झटका लगा। पिता की बनाई पार्टी उद्धव ठाकरे के हाथ से आखिरकार पूरी तरह से निकल गई। पार्टी का नाम तो गया ही साथ ही चुनाव निशान भी ठाकरे परिवार के हाथ से चला गया। 

ऐसा नहीं है शिवसेना में पहली बार कोई बगावत हुई थी। इससे पहले भी तीन बार पार्टी में बगावत हुई। लेकिन, 57 साल में पहली बार होगा जब बिना ठाकरे सरनेम का कोई नेता पार्टी का प्रमुख बनेगा। आइये इस फैसले का ठाकरे परिवार पर पड़ने वाले असर के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही इस बगावत से पहले पार्टी में हुई बगावतों की कहानी भी जानते हैं। 

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उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और बालासाहेब ठाकरे - फोटो : Amar Ujala
19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया। पार्टी के 57 साल के इतिहास में ठाकरे परिवार को शुक्रवार को सबसे बड़ा झटका लगा। पिता की बनाई पार्टी उद्धव ठाकरे के हाथ से आखिरकार पूरी तरह से निकल गई। पार्टी का नाम तो गया ही साथ ही चुनाव निशान भी ठाकरे परिवार के हाथ से चला गया। 

ऐसा नहीं है शिवसेना में पहली बार कोई बगावत हुई थी। इससे पहले भी तीन बार पार्टी में बगावत हुई। लेकिन, 57 साल में पहली बार होगा जब बिना ठाकरे सरनेम का कोई नेता पार्टी का प्रमुख बनेगा। आइये इस फैसले का ठाकरे परिवार पर पड़ने वाले असर के बारे में जानते हैं। इसके साथ ही इस बगावत से पहले पार्टी में हुई बगावतों की कहानी भी जानते हैं। 

उद्धव ठाकरे। - फोटो : ANI
उद्धव गुट पर इसका क्या असर होगा?
चुनाव आयोग के फैसले के बाद पार्टी के कार्यालयों से लेकर पार्टी से जुड़े सभी संसाधनों को लेकर भी लड़ाई शुरू हो सकती है। शिवसेना भवन को लेकर भी शिंदे गुट अब अपना अधिकार जता सकता है। हालांकि, एक्सपर्ट कहते हैं कि इसके लिए ये देखना होगा कि शिवसेना भवन किसके नाम पर है। अगर किसी ट्रस्ट के जरिए इसका रजिस्ट्रेशन है तो उस ट्रस्ट में कौन-कौन शामिल है।  

ठाकरे गुट के पास रास्तों की बात करें तो सबसे पहले उद्धव गुट आयोग के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। उद्धव गुट कोर्ट का फैसला आने तक चुनाव आयोग के आदेश पर रोक लगाने की मांग कर सकता है। वहीं, जल्द ही होने वाले बीएमसी चुनाव में उद्धव गुट नए पार्टी के नाम और चुनाव निशान पर लड़कर बेहतर प्रदर्शन करके आयोग के फैसले पर सवाल खड़ा कर सकता है। इसे लेकर संजय राउत का बयान भी सामने आया है। राउत ने कहा कि हम नया चुनाव चिह्न लेकर लोगों के बीच जाएंगे और फिर से वही शिवसेना बनाकर दिखाएंगे। 

छगन भुजबल - फोटो : Facebook@Chhagan Bhujbal
पहले कब-कब हुई थी शिवसेना में बगावत और तब क्या हुआ था?
1. जब बाल ठाकरे से छगन भुजबल ने विद्रोह किया 

ये कहानी तब की है जब महाराष्ट्र की राजनीति में बाला साहेब ठाकरे का दबदबा हुआ करता था। तब छगन भुजबल की पहचान दबंग ओबीसी नेता के रूप में थी। वह बाल ठाकरे के सबसे करीबी नेताओं में से एक माने जाते थे। हालांकि, दोनों के बीच साल 1985 से विवाद शुरू हो गया। उस साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद शिवसेना सबसे बड़ा विरोधी दल बनकर उभरी। 

जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने की बारी आई तो भुजबल को लगा कि जाहिर तौर पर बाल ठाकरे उन्हें ही ये जिम्मेदारी देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भुजबल को ये जानकर सदमा लगा कि नेता प्रतिपक्ष का पद ठाकरे ने मनोहर जोशी को दे दिया। इसके बाद भुजबल को प्रदेश की राजनीति से हटाकर शहर की राजनीति तक सीमित कर दिया गया। उन्हें मुंबई का मेयर बनाया गया। 

इस बीच केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की गठबंधन सरकार आ गई जिसने मंडल आयोग की पिछड़ा आरक्षण को लेकर की गईं सिफारिशें लागू करना तय किया। महाराष्ट्र में शिवसेना की पार्टनर, बीजेपी इस फैसले का समर्थन कर रही थी, लेकिन शिवसेना विरोध में थी। ओबीसी समाज से आने वाले भुजबल को ये बात ठीक नहीं लगी। 

मार्च 1991 में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर मनोहर जोशी के खिलाफ बयान दिया। ये भी साफ कर दिया कि अब वह मुंबई का दोबारा मेयर नहीं बनना चाहते हैं। उन्हें विपक्ष का नेता बनाया जाना चाहिए। ये बातें सुनकर बाल ठाकरे ने जोशी और भुजबल को मातोश्री बुलाया और समझौते की कोशिश की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। 

पांच दिसंबर 1991 को भुजबल ने बाल ठाकरे के खिलाफ विद्रोह कर दिया। 8 शिवसेना के विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को खत सौंपा कि वे शिवसेना-बी नाम का अलग से गुट बना रहे हैं और मूल शिवसेना से खुद को अलग कर रहे हैं। 

स्पीकर ने भुजबल के गुट को मान्यता दे दी जिसके बाद उन्होंने अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस की सदस्यता ले ली। इस तरह से शिवसेना को भुजबल ने दो फाड़ कर दिया। ये पहली बार था जब ठाकरे परिवार को कहीं से धोखा मिला था। 

नारायण राणे - फोटो : पीटीआई
2. नारायण राणे ने 10 विधायकों संग की थी बगावत
शिवसेना को दूसरी बार तब झटका लगा था, जब 2005 में नारायण राणे ने बगावत की। राणे ने शिवसेना के साथ अपने सियासी सफर की शुरुआत की थी। साल 1968 में केवल 16 साल की उम्र में ही नारायण राणे युवाओं को शिवसेना से जोड़ने में जुट गए।

शिवसेना में शामिल होने के बाद नारायण राणे की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती चली गई। युवाओं के बीच नारायण राणे की ख्याति को देखकर शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे भी प्रभावित हुए। उनकी संगठन की क्षमता ने उन्हें जल्द ही चेंबूर में शिवसेना का शाखा प्रमुख बना दिया। 

साल 1985 से 1990 तक राणे शिवसेना के कॉरपोरेटर रहे। साल 1990 में वो पहली बार शिवसेना से विधायक बने। इसके साथ ही वो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बने। राणे का कद शिवसेना में तब और बढ़ गया जब छगन भुजबल ने शिवसेना छोड़ दी। 

साल 1996 में शिवसेना-बीजेपी सरकार में नारायण राणे को राजस्व मंत्री बनाया गया। इसके बाद मनोहर जोशी के मुख्यमंत्री पद से हटने पर राणे को सीएम की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला। एक फरवरी 1999 को शिवसेना-बीजेपी के गठबंधन वाली सरकार में नारायण राणे मुख्यमंत्री बने। 

हालांकि, ये खुशी चंद दिनों की थी। जब उद्धव ठाकरे को शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया तो नारायण राणे के सुरों में बगावत हावी होने लगी। राणे ने उद्धव की प्रशासनिक योग्यता और नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए। इसके बाद नारायण राणे ने 10 शिवसेना विधायकों के साथ शिवसेना छोड़ दी और फिर तीन जुलाई 2005 को कांग्रेस में शामिल हो गए। 

राज ठाकरे - फोटो : social media
3. राज ठाकरे ने जब नई पार्टी बना ली
बाल ठाकरे के भतीजे और उद्धव ठाकरे के भाई राज ठाकरे पहले शिवसैनिक हैं, जिन्होंने शिवसेना छोड़ने के बाद नई पार्टी बनाई। राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना ने नाता तोड़ लिया था। इसके बाद 2006 में उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया। शिवसेना से अपनी राह अलग करने के बाद उनके साथ विधायक भले ही नहीं गए, लेकिन बड़े पैमाने पर काडर से जुड़े लोग उनके पीछे-पीछे शिवसेना छोड़ चल पड़े।
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