उत्तर प्रदेश में होने वाले लोकसभा उपचुनाव में सबसे ज्यादा निगाहें आजमगढ़ लोकसभा सीट पर लगी हुई हैं। इस सीट पर नामांकन खत्म होने के एक रोज पहले ही अखिलेश यादव ने अपने भाई धर्मेंद्र यादव को इस सीट से प्रत्याशी बनाया है। जबकि इससे पहले चर्चा प्रमुख दलित नेता बलिहारी बाबू के बेटे सुशील आनंद को लेकर लगाई जा रही थी। लेकिन एन मौके पर सुशील को टिकट नहीं मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव के पास एक बहुत बड़ा मौका दलितों के बड़े नेता पर दांव लगाकर एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग करने का था। खासकर तब जब मायावती लगातार समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक मुस्लिमों की पैरवी कर बसपा को उनका हितैषी बताने की बात करती रहती हैं। शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को टिकट देकर एक बार फिर मायावती ने आजमगढ़ में मुस्लिम कार्ड खेलने की जोर आजमाइश की है। लेकिन इस बार का आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव उतना आसान नहीं है जितना कि 2019 के चुनाव में था।
उत्तर प्रदेश की राजनीति को बहुत करीब से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषक ओपी मिश्रा कहते हैं कि क्योंकि आजमगढ़ समाजवादी पार्टी का गढ़ है। इसलिए अखिलेश यादव अपनी परंपरागत सीट को खोना नहीं चाहते थे। शायद यही वजह है कि उन्होंने अंतिम समय में अपने ही परिवार के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को लोकसभा का प्रत्याशी बनाया है। मिश्रा कहते हैं कि हालांकि हर चुनाव में जीत और हार राजनीतिक पार्टियों के लिए निश्चित तौर पर मायने रखती है, लेकिन उपचुनाव के नजरिए से इसमें आप कुछ प्रयोग अवश्य कर सकते हैं। भले ही उसके परिणाम पार्टी के पक्ष में आए या विपक्ष में। ऐसे में अखिलेश यादव के पास दलितों को साधने का एक बहुत बड़ा माध्यम आजमगढ़ का उपचुनाव बन रहा था। उनका कहना है कि मायावती जब लगातार समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक मुस्लिमों पर अपना हक जता कर उनको अपने साथ जोड़ने की लगातार कोशिशें कर रही हैं। ऐसे में दलितों को अपने पाले में जोड़ने के लिए बलिहारी बाबू के बेटे सुशील आनंद एक बेहतर विकल्प हो सकते थे। जिसकी चर्चा उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में लगातार बनी हुई थी। ऐसे में समाजवादी पार्टी ने उपचुनाव में बसपा के कोर वोट बैंक दलितों को अपने पाले में जोड़ने की एक कवायद की जा सकती थी। संभव है उसके परिणाम उनके पक्ष में भी आ सकते थे और यह भी संभव था कि परिणाम इस प्रयोग के विपरीत भी जा सकते थे।
जीडी सिंह कहते हैं कि जिस तरीके से मायावती ने अपने दलित वोट बैंक के साथ मुस्लिम नेता शाह आलम गुड्डू जमाली पर दांव लगाया है, इससे उन्हें जीत का रास्ता नजर आ रहा है। सिंह का कहना है कि अगर समाजवादी पार्टी की ओर से किसी दलित को प्रयोग के तौर पर टिकट दिया जाता, तो संभव था कि दलित, मुस्लिम और यादव का त्रिकोणीय समीकरण मिलकर इस चुनाव में नई तस्वीर लेकर आता। अगर यह प्रयोग समाजवादी पार्टी के लिए सफल रहता, तो इसके माध्यम से सपा 2024 के लोकसभा चुनावों से लेकर आने वाले विधानसभा के चुनावों में इस नए जातिगत समीकरणों वाले पॉलिटिकल कॉन्बिनेशन के साथ आगे बढ़ सकती थी। हालांकि जीडी सिंह का कहना है समाजवादी पार्टी ने कोई भी प्रयोग किए बगैर इस बार अपनी परंपरागत सीट पर अपने ही परिवार के प्रत्याशी को खड़ा करके जीतने की गुंजाइश को और प्रबल तो कर ही दिया है।
राजनीतिक विश्लेषक उमेश त्यागी कहते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव को ही अगर आप देखें, तो पाएंगे कि मुलायम सिंह यादव अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के रमाकांत यादव से तकरीबन 64000 वोटों से ही जीते थे। 2014 के लोकसभा चुनावों में मुलायम सिंह यादव को 340306 वोट मिले थे, जबकि भाजपा के रमाकांत यादव को 277102 वोट मिले थे। त्यागी कहते हैं कि 2014 के चुनाव में ही बसपा के शाह आलम गुड्डू जमाली को 266528 वोट मिले थे। उनका कहना है 2014 के चुनावों से 2022 के चुनावों की तुलना की जा सकती है। क्योंकि 2019 का चुनाव तो सपा-बसपा के गठबंधन का चुनाव था। इस बार न तो वह गठबंधन है और 2014 के तीसरे नंबर के रहे प्रत्याशी गुड्डू जमाली बसपा के बड़े उम्मीदवार के तौर पर सामने हैं। वहीं 2019 के निकटतम प्रतिद्वंदी दिनेश लाल यादव निरहुआ मजबूती के साथ मैदान में चुनाव लड़ रहे हैं। वह कहते हैं कि ऐसे में एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि आजमगढ़ का उपचुनाव उतना आसान नहीं है जितना कि समझा जाता रहा है। इस बार मामला न सिर्फ त्रिकोणात्मक है बल्कि समाजवादी पार्टी के लिए ज्यादा मेहनत वाला चुनाव भी लग रहा है।