धवन ने कहा कि धर्मशास्त्र के बारे में खुद से परिकल्पना नहीं की जा सकती। जन्मस्थान, विश्वास व आस्था पर आधारित है और अगर इस दलील को स्वीकार कर लिया गया तो इसका व्यापक असर पड़ेगा। वैदिक काल में सूर्य, नदी, पेड़ आदि की पूजा होती थी। हिन्दू पक्ष की दलील है कि ये तमाम चीजें न्यायिक व्यक्ति हैं। लेकिन ये न्यायिक व्यक्ति नहीं है बल्कि यह हृदय का भाव है। धवन ने कहा कि किसी समय कोई विश्वास एक वस्तुगत रूप बन जाता है और वहीं न्यायिक व्यक्ति बन जाता है।
इस पर पीठ के सदस्य जस्टिस भूषण ने सवाल किया कि जन्मस्थान, महाकाव्यों सहित अन्य चीजों पर आधारित है लेकिन मूर्ति की अवधारणा अलग है। स्वयंभू की अवधारणा भी जन्मस्थान से अलग है। वहीं जस्टिस बोबडे ने सवाल किया कि क्या किसी अस्तित्व को न्यायिक व्यक्ति बनने केलिए उसका दैविक होना जरूरी है?
जवाब में धवन ने कहा, धर्मशास्त्रों में अपने से कुछ नहीं जोड़ा जा सकता। इस बारे में बहुत कुछ चर्चाएं चलती रही हैं। जैसे कि पीएम मोदी कहते हैं देश बदल रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि संविधान बदला जा रहा है।
एक बार मस्जिद बन गई तो हमेशा मस्जिद ही रहेगी
राजीव धवन ने कहा कि सन 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी और 22 दिसंबर 1949 तक वहां लगातार नमाज होती रही। उस वक्त तक वहां कोई मूर्ति नहीं थी। धवन ने कहा कि एक बार मस्जिद हो गई तो वह हमेशा मस्जिद ही रहेगी।
क्या मूर्ति रखने से उस स्थल पर दावा ठोंका जा सकता है
धवन ने यह भी कहा कि 22 दिसंबर, 1949 से पहले उस जगह पर कोई मूर्ति नहीं थी। 22 दिसंबर, 1949 की रात को जबरन भीतरी गुंबद के नीचे मूर्ति रख दी गई। धवन ने सवाल किया कि जबरन मूर्ति रखकर हिन्दू पक्षकारों की ओर से उस जमीन पर कब्जे का दावा कैसे दावा किया जा सकता है? मालिकाना हक के खिलाफ हिन्दू पक्ष का कब्जा रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि हर मूर्ति भी न्यायिक व्यक्ति नहीं हो सकता। धवन ने कहा कि हमारा मानना है कि जो भी शासक रहा हो या उसने धर्म का उल्लंघन कर कुछ किया हो, लेकिन आखिर में उसे संविधान के पैमाने से ही देखा जाएगा।