मूर्ति होना या न होना महत्वपूर्ण नहीं
हिंदू पक्षकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील के. परासरन ने कहा कि विवादित जगह पर मूर्ति थी या नहीं, यह महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। हिंदू मान्यताओं में परम ईश्वर एक ही है लेकिन लोग अलग-अलग रूप या आकार में और मंदिरों में पूजा करते हैं। कहीं मूर्तियों के साथ पूजा होती है तो कहीं बिना मूर्ति की। कहीं, साकार कहीं निराकार उपासना होती है। इन विविधताओं के बीच समानता यही है कि लोग देवता की पूजा करते हैं। परासरन ने कहा, पूजा का मकसद होता है देवत्व की पूजा। मूर्ति न होने के आधार पर जन्मस्थान पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
1885 का और मौजूदा वाद एक जैसा : सुन्नी वक्फ बोर्ड
वहीं, अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शेखर नाफडे ने कहा कि मौजूदा वाद और 1885 का वाद, एक जैसा है। अंतर सिर्फ इतना है कि 1885 में हिंदू पक्ष ने विवादित स्थल के एक हिस्से पर दावा ठोंका था, लेकिन अब पूरे विवादित स्थल पर मालिकाना हक मांग रहे हैं।
चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष नाफडे ने पूछा कि क्या 1885 में महंत रघुवर दास का वाद, सभी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व कर रहा था या नहीं? अगर जवाब ‘हां’ में है तो हिंदू पक्ष दूसरा वाद दाखिल नहीं कर सकता। इस पर संविधान पीठ के सदस्य जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि दोनों मामलों की विषयवस्तु में अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है।