तमिलनाडु में ताड़ की सदियों पुरानी विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ने के लिए ताड़ महोत्सव शुरू हुआ, जहां बच्चों ने ताड़ से खाद्य पदार्थ और हस्तशिल्प बनाए। कभी तमिल साहित्य से लेकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक का आधार रहा ताड़ आज सिमट रहा है, तो क्या ऐसे आयोजन इसकी परंपरा को फिर जीवित कर पाएंगे? पढ़िए रिपोर्ट
जिस पेड़ के पत्तों पर सदियों तक तमिल साहित्य लिखा और सहेजा गया, उसी ताड़ को नई पीढ़ी से दोबारा जोड़ने की कोशिश शनिवार से यह शुरू हुई। तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले में ऑरोविल के इसाई अंबलम स्कूल में दो दिवसीय ताड़ महोत्सव शुरू हुआ, जिसमें बच्चों ने ताड़ से खाना बनाया, हस्तशिल्प तैयार किया और पारंपरिक खेलों में हिस्सा लिया। आयोजन ऑरविल फाउंडेशन और शिक्षा मंत्रालय ने मिलकर किया। इसमें ऑरोविल और आसपास के पुडुचेरी क्षेत्र के बच्चे, शिक्षक और अभिभावक शामिल हुए।
महोत्सव का मकसद बच्चों को यह बताना था कि ताड़ तमिल जीवन में सिर्फ एक पेड़ नहीं है। गर्मियों में नुगु, सुबह का पदनीर, साल भर का ताड़ का गुड़, छत छाने के लिए पत्ते और लिखने के लिए ओलै, यनी पत्तों की पट्टियां, सब इसी एक पेड़ से आते रहे हैं। तमिलनाडु का राजकीय वृक्ष भी यही है। पछले कुछ दशकों में ताड़ पर टिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिकुड़ी है और पेड़ पर चढ़ने वाला हुनर भी नई पीढ़ी तक नहीं पहुंचा है। बच्चों ने ताड़ से मिलने वाली चीजों से कई खाद्य पदार्थ खुद तैयार किए। इनमें ताड़ के फल का जैम, पनंगूड़ यानी ताड़ की जड़ के आटे से बना पौष्टिक पेय, जड़ के आटे के लड्डू, केक, बिस्कुट और ताजा पेय शामिल रहे।