पिछले दिनों जब जम्मू कश्मीर में हालात बिगड़े और पीडीपी एनडीए गठबंधन से अलग हुई तब जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि कश्मीर पर अटल बिहारी वाजपेयी की रणनीति को अपनाने की जरूरत है। महबूबा ने कहा था की कश्मीर मसले पर डोर के सिरे को वहीं से पकड़े जाना चाहिए जहां वाजपेयी ने उसे छोड़ा था।
कश्मीर के ज्यादातर राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी के काल को याद करते हैं और उनकी कश्मीर नीति की चर्चा करते हैं और उसे ही अपनाने की बात करते हैं। लेकिन अक्सर सवाल उठता है कि आखिर वाजपेयी ने ऐसा कौन सा जादू किया था जो उनके बाद के प्रधानमंत्री नहीं कर पाए।
लेकिन अगर वाजपेयी जी के कार्यकाल पर नजर डालें तो आप पाएंगे कि कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने कुछ खास नहीं किया था, लेकिन उनकी छवि ऐसी है कि ढेरों कश्मीरी ये कहते नजर आते हैं कि कश्मीर को लेकर वाजपेयी की नीति सही थी।
कश्मीर में जब भी संकट बढ़ता है तो लोगों को वाजपेयी के नारे कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत याद आती है। जब उनके कार्यकाल के दौरान कश्मीर मसला शांत था। वाजपेयी शुरू से मानते थे कि हर विवाद का अंत बातचीत ही है। वाजपेयी कश्मीर को शांत रखने का तरीका जानते थे और ये तरीका था पाकिस्तान के साथ बातचीत जारी रखा। उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में पाकिस्तान से लगातार बातचीत जारी रखी।
वाजपेयी ये समझते थे कि कश्मीर में शांति बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के साथ कुछ ना कुछ बातचीत जरूरी है। यही वजह है कि कारगिल युद्ध और संसद पर हमले के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखा था। यही नहीं वाजपेयी ये भी जानते थे कि कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार के कई फैसले गलत रहे हैं और कोई भी राष्ट्रीय स्तर का नेता कश्मीरियों के दुख को नहीं समझ सका है।
atal bihari vajpayee
- फोटो : amar ujala
'दिलों के दरवाज़े खुले हैं'
18 अप्रैल, 2003 को श्रीनगर में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, 'हम लोग यहां आपके दुख और दर्द को बांटने आए हैं। आपकी जो भी शिकायतें हैं, हम मिलकर उसका हल निकालेंगे। आप दिल्ली के दरवाजे खटखटाएं। दिल्ली की केंद्र सरकार के दरवाजे आपके लिए कभी बंद नहीं होंगे। हमारे दिलों के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे।"
उनके इस बयान ने ही जादू का काम किया। कश्मीरियों को पहली बार लगा कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री उनके दुखों की बात कर रहा है, उसे मान रहा है। अपनी इसी सभा में वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ उतार चढाव भरे संबंधों और संसद पर हमले के बाद भी पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने जम्मू एवं कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाया था कि वे हर समस्या का हल बातचीत से करना चाहते हैं- घरेलू भी और बाहरी भी।
इसी यात्रा में उन्होंने अलगाववादियों सहित सभी कश्मीरियों से इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत के दायरे में बातचीत की पेशकश की थी। उससे पहले जितनी बार भी केंद्र सरकार ने अलगाववादियों के साथ बातचीत की पेशकश की थी, उसमें भारतीय संविधान के दायरे की बात कही गई थी, जिसपर अलगाववादी कभी सहमत नहीं हुए।
लेकिन शब्दों की जादूगरी के साथ वाजपेयी अलगावादियों को बातचीत तक लाने में कामयाब रहे। उन्होंने संविधान के दायरे के अंदर बातचीत की पेशकश नहीं की। इस तरीके से उन्होंने अलगावादियों के साथ बातचीत का रास्ता खोला और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया।
ऐसे उन्होंने ये सुनिश्चित कर दिया कि पाकिस्तान अलगाववादियों को बातचीत करने से नहीं रोकेगा। उनकी इस पेशकश के बाद अलगाववादी नेताओं ने तत्कालीन उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से मुलाकात की थी और कश्मीर में हालात सामान्य हुए थे।