ईसाई बहुल मिजोरम में चर्च एक अलग किस्म की भूमिका में है। राज्य में पूरा जनजीवन ही चर्च के इर्द-गिर्द सिमटा है और राजनीति भी इसका अपवाद नहीं है। खासकर चुनावों के दौरान इसकी मिसाल उभर कर सामने आती है। धर्म और राजनीति का सटीक मेल देखने के लिए मिजोरम से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती। राजधानी आइजल की सड़कों पर रविवार को होने वाली प्रार्थना सभाओं में जितनी भीड़ उमड़ती है, उतनी किसी चुनावी रैली में कल्पना भी नहीं की जा सकती।
राज्य के सबसे ताकतवर चर्च मिजोरम प्रेसबाइटेरियन चर्च और दूसरे चर्चों के समर्थन से बने गैर-सरकारी संगठन मिजोरम पीपुल्स फोरम (एमपीएफ) ने सभी राजनीतिक पार्टियों को रोड शो आयोजित करने,घर-घर जाकर प्रचार करने और रैलियां आयोजित करने से मना किया है। संगठन ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए कुछ दिशानिर्देश जारी किए हैं। और उनका असर साफ नजर आता है। पैसों और बाहुबल के सहारे चुनाव लड़ना देश के बाकी राज्यों में जहां जीत की गारंटी है, वहीं यहां यह उम्मीदवारों की हार की वजह बन सकता है।
मिजोरम विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले हेनरी कहते हैं कि मिजोरम में चर्च से ज्यादा ताकतवर कुछ भी नहीं है। यह राज्य में समाज से लेकर राजनीतिक तक को नियंत्रित करता है। चर्च के लोग धर्म और राजनीति के इस मेल को गलत नहीं मानते। ऐसे ही एक नेता लालकिमी कहते हैं कि मिजो लोग शुरू से ही ईसाईयत को मानते रहे हैं। यहां राजनीति में अलग-अलग दल हैं। लेकिन इन दोनों यानी चर्च और राजनीति में कोई टकराव नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषक वानलालुरेट कहते हैं कि यहां चुनावी माहौल देश के दूसरे हिस्सों से अलग होता है। राजधानी आइजल में भी ज्यादा शोरगुल नहीं दिखाई देता। कुछ लोगों को लगता है कि मिजोरम के चुनावी मॉडल को देश के दूसरे हिस्सों में लागू कर चुनाव खर्च को काफी कम किया जा सकता है। लेकिन आइजल के पाछूंगा यूनिवर्सिटी कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर लालथालमुआना को नहीं लगता कि यह मॉडल दूसरे हिस्सों में प्रभावी होगा।
वह कहते हैं कि किसी तटस्थ संगठन की देख-रेख में चलने वाले चुनाव अभियान का फायदा यह है कि मतदाताओं में पैसे बांटने के मामले सुनने को नहीं मिलते। लेकिन यह मॉडल दूसरे राज्यों में काम नहीं करेगा। वह कहते हैं कि राजनीति में धार्मिक संगठनों के हस्तेक्षप को दूसरे राज्यों में कोई भी राजनीतिक पार्टी स्वीकार नहीं करेगी।