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Assam-Meghalaya Dispute: एसपी चाहें तो अकेले ही रोक सकते हैं हिंसा, बॉर्डर से क्यों गायब है जिला प्रशासन?

सार

Assam-Meghalaya Dispute: नॉर्थ ईस्ट मामलों के जानकार रत्न ज्योति दत्ता बताते हैं कि इस घटना में कानून व्यवस्था बिगड़ने जैसी कोई बात नहीं है। इसे सीमा विवाद से जोड़ना भी ठीक नहीं होगा। यह स्थानीय स्तर पर हुई एक झड़प है। जंगल में लकड़ी तस्करी का मुद्दा है...
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Assam-Meghalaya dispute असम-मेघालय सीमा पर हिंसा - फोटो : ANI (File Photo)
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विस्तार
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असम-मेघालय सीमा पर 22 नवंबर को हुई हिंसा के बाद तनाव है। फायरिंग में पांच ग्रामीण और असम वन रक्षा विभाग का एक जवान मारा गया। कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। दोनों राज्यों की सरकारों का अपना तर्क है। असम सरकार का कहना है कि अवैध लकड़ी की तस्करी कर रहे एक ट्रक को वन रक्षकों ने रोका, तो मेघालय की तरफ से आए लोगों ने उन्हें घेर लिया। रक्षाकर्मियों ने खुद को बचाने के लिए फायरिंग कर दी। मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने कहा, असम पुलिस और वन रक्षकों ने मेघालय की सीमा में घुसकर बिना किसी वजह के फायरिंग कर दी। उत्तर पूर्व के जानकार बताते हैं कि राज्य स्तर की पहल को छोड़ो, अगर वहां पुलिस कप्तान चाहे तो हिंसा बंद हो सकती है। इस सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि सीमावर्ती क्षेत्र से 'जिला प्रशासन' क्यों गायब रहता है।

यहां पर बॉर्डर विवाद जैसा कुछ नही है

दिल्ली स्थिति वरिष्ठ पत्रकार और नॉर्थ ईस्ट मामलों के जानकार रत्न ज्योति दत्ता बताते हैं कि इस घटना में कानून व्यवस्था बिगड़ने जैसी कोई बात नहीं है। इसे सीमा विवाद से जोड़ना भी ठीक नहीं होगा। यह स्थानीय स्तर पर हुई एक झड़प है। जंगल में लकड़ी तस्करी का मुद्दा है। असम की ओर से वन विभाग ने तस्करों को रोका, तो आसपास के लोगों ने बवाल कर दिया। असम पुलिस और वन विभाग की तरफ से हुई फायरिंग में मेघालय के पांच ग्रामीण मारे गए। असम वन रक्षा विभाग के एक जवान की भी मौत हो गई। कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। हालांकि घटना के बाद असम सरकार ने इस मामले को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कह चुके हैं कि इस मामले में गोली नहीं चलानी चाहिए था। ये बात ठीक है कि मिजोरम व असम के बीच पहले से ही सीमा विवाद चल रहा है, लेकिन यहां पर बॉर्डर विवाद जैसा कुछ नही है। ये पूरी तरह से जंगल का इलाका है। असम की तरफ कई किलोमीटर अंदर तक के इलाके में जमीन के दाम काफी तेजी से बढ़े हैं। कुछ इलाका समतल भी है।

बाहर वालों से 75 प्रतिशत सुरक्षित है ये इलाका

जब असम से अलग होकर मेघालय अस्तित्व में आया, तो कुछ मुद्दे अनसुलझे रह गए थे। उन पर बातचीत चल रही है। तब दोनों राज्यों की सीमा पर जंगल था। आज असम में तेजी से विकास हो गया है। जब विकास हुआ तो जमीनों की कीमत भी बढ़ गई। कहीं पर ढाबा तो कहीं रिर्सोट खुल चुके हैं। अर्थव्यवस्था ने गति पकड़ी है। यहां पर बाहर वालों से कोई बड़ा खतरा नहीं है। पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में जब तक शेख हसीना प्रधानमंत्री हैं, तब तक भारत के सीमावर्ती इलाके 75 फीसदी सुरक्षित हैं। दोनों राज्यों के सीमावर्ती इलाकों में हिंसा की जो घटनाएं होती हैं, वे शहरी क्षेत्रों से दूर हैं। तस्कर हैं तो वे तुरंत मेघालय में प्रवेश कर लेते हैं। पुलिस को गच्चा दे देते हैं। वहां पुलिस चौकी में पांच लोग होते हैं तो तस्कर पचास होते हैं।

पुलिस कप्तान ठान लें तो बंद हो सकती है हिंसा

वहां पर असल दिक्कत तो प्रशासनिक व्यवस्था की है। डीएस व एसपी जैसे जिम्मेदार अधिकारियों को उन इलाकों में आए अर्सा हो जाता है। नियमित पुलिस गश्त हो, सुरक्षा बलों की दो चार कंपनी वहां तैनात कर दी जाएं। इसके बाद देखें, झड़प कैसे बंद नहीं होती है। पुलिस की बड़ी भूमिका है। अगर दोनों राज्यों के सीमावर्ती जिलों के पुलिस कप्तान, ठान लें तो वहां हिंसा का सवाल ही नहीं उठता। हिंसा की समस्या का इलाज, स्टेट के पास नहीं, बल्कि जिला प्रशासन के पास है। एसपी को खुद मौके पर जाना चाहिए। वे कुछ समय वहां रहें। ये देखें कि वहां कितने थाने हैं। कितनी नई चौकी या थाने खोले जाने हैं। वहां संचार के साधन तक नहीं हैं। मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। ऐसे में सीसीटीवी कहां से लगेंगे। पुलिस आधुनिकीकरण का पैसा तो शहर में ही खत्म हो जाता है। इन जंगलों तक वह पैसा नहीं पहुंच पाता। नतीजा, लकड़ी की तस्करी जमकर होती है। पांच सात किलोमीटर तक तो जंगल ही जंगल है। निकटवर्ती टाउन वाले स्टेट को पहल करनी चाहिए। बॉर्डर इलाके पर नजदीकी टाउन असम राज्य का है। मिजोरम या मेगालय का नजदीकी टाउन बहुत दूर है। असम की तरफ से पहल हो सकती है। ये आसान भी है। असम में प्लेन इलाके शुरु होते हैं। यहां पर सर्विलांस का बेहतर तरीका विकसित किया जा सकता है।

दोनों राज्यों के बीच हो चुके हैं कई विवाद

साल 2010 में लंगपीह में हुई हिंसा के दौरान चार लोगों की मौत हो गई थी। उस वक्त भी पुलिस की गोलीबारी हुई थी। गत वर्ष जुलाई में भी असम-मिजोरम सीमा पर भीषण हिंसा हुई, जिसमें असम पुलिस के छह जवानों की मौत गई थी। जानकारों का कहना है कि अभी तक इन राज्यों की वोटर लिस्ट पूरी तरह अपडेट नहीं है। कोई व्यक्ति रहता किसी राज्य में है, तो उसका नाम दूसरे प्रदेश की वोटर लिस्ट में है। कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां सीमा रेखा स्पष्ट न होने के कारण विवाद होता रहता है। ये विवाद पचास वर्षों से चले आ रहे हैं। मेघालय, 1970 में असम से एक स्वायत्त क्षेत्र के रूप में अलग हुआ था। दो साल बाद इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। दोनों राज्यों के बीच 884.9 किमी लंबी सीमा पर दर्जनभर ऐसे क्षेत्र हैं, जहां विवाद रहा है। हालांकि इनमें से छह जगहों पर सीमा विवाद सुलझ चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले कह चुके हैं, इन राज्यों के नक्शे औपनिवेशिक काल में खींचे गए थे। उस वक्त सीमा रेखा को अंतिम रूप देते वक्त स्थानीय लोगों के रहन-सहन और उनके तौर-तरीकों की अनदेखी हुई थी। कुछ लोग ऐसे भी रहे, जिनकी खेती बाड़ी, मकान और जंगल, दो राज्यों की प्रशासनिक सीमाओं में विभाजित हो गए।

दोनों राज्यों के बीच मामला सुलझाने के प्रयास जारी हैं

इस साल की शुरुआत में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और मेघालय के कॉनराड संगमा संगमा ने दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अंतर्गत छह विवादित क्षेत्रों में दोनों राज्यों की सीमा निर्धारित की गई। 2743 किलोमीटर लंबी सीमा वाले असम की सीमा मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और पश्चिम बंगाल से लगती है। ऐसे में असम का मेघालय, नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर के साथ सीमा विवाद चल रहा है।

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