अदालत ने कहा कि सरकार को वन भूमि की जांच की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे अवैध घुसपैठ रुक सके। जंगलों में तारबंदी और बोर्ड लगाए जाएं। खंडपीठ ने कहा कि यह तभी हो सकता है, जब अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से काम करें।
गौहाटी उच्च न्यायालय ने गोलाघाट जिले के दोयांग और नामबोर आरक्षित वन क्षेत्र में रह रहे परिवारों से सात दिनों के भीतर वन क्षेत्र को खाली करने का निर्देश दिया है। साथ ही उच्च न्यायालय ने ऐसी व्यवस्था बनाने का भी निर्देश दिया है ताकि भविष्य में फिर से आरक्षित वन क्षेत्र में अतिक्रमण न हो सके। मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने सोमवार दिए अपने आदेश में परिवारों को रविवार तक आरक्षित वन क्षेत्र का इलाका खाली करने का निर्देश दिया और कहा कि अगर ये लोग अतिक्रमण नहीं हटाते हैं तो सरकार अतिक्रमण हटा सकती है।
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क्या है पूरा मामला
दरअसल 74 लोगों ने जिला प्रशासन के नोटिस के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया था। जिला प्रशासन ने इन परिवारों को सात दिनों के भीतर अवैध कब्जा हटाने का आदेश का नोटिस दिया था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया किया कि जिला प्रशासन का नोटिस असम भूमि और राजस्व नियंत्रण, 1886 और असम भूमि नीति, 2019 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा 13 दिसंबर 2024 को दिए गए आदेश के भी खिलाफ है। इस पर उच्च न्यायालय ने 5 अगस्त को याचिकाकर्ताओं को भूमि अधिकार से जुड़े दस्तावेजी सबूत जमा करने का निर्देश दिया और अगर याचिकाकर्ता ऐसा नहीं कर पाते हैं तो अदालत ने याचिकाकर्ताओं को वन भूमि खाली करने का निर्देश दिया।
सरकार को 15 दिन पहले नोटिस देना चाहिए
सोमवार को इस मामले पर फिर से सुनवाई हुई, जिसमें खंडपीठ ने कहा कि अदालत पहले ही याचिकाकर्ताओं को वन भूमि खाली करने के लिए पर्याप्त समय दे चुकी है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि अगर भविष्य में वह कोई जगह खाली कराती है तो 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए और नोटिस के बाद और 15 दिन जगह खाली करने के लिए दिए जाएं, ताकि लोगों को पर्याप्त समय मिल सके। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए ताकि वन भूमि पर अवैध कब्जा न हो सके।
'अधिकारी ईमानदारी से काम करें, तभी अवैध अतिक्रमण रुक सकता है'
अदालत ने कहा कि सरकार को वन भूमि की जांच की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे अवैध घुसपैठ रुक सके। जंगलों में तारबंदी और बोर्ड लगाए जाएं। खंडपीठ ने कहा कि यह तभी हो सकता है, जब अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से काम करें। अगर आरक्षित वन में कोई अतिक्रमण पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उच्च न्यायालय ने कहा कि वन क्षेत्र की लगातार निगरानी करने की जरूरत है ताकि अवैध अतिक्रमण पर रोक लग सके।
असम सरकार जून से अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई कर रही है और जून से नौ जगहों पर अतिक्रमण हटाया गया है, जिसमें 50 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। विस्थापित हुए लोगों में अधिकतर बंगाली भाषी मुस्लिम हैं। घुसपैठ करने वाले लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज इन जंगलों में बसे थे क्योंकि उनकी जमीन ब्रह्मपुत्र नदी के मृदा कटाव में बह गई थी।