असम में ज्यादातर लोगों को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से कोई नाराजगी नहीं है, लेकिन भाजपा का बदलाव का नारा उन्हें लुभा रहा है। लेकिन दाल का भाव 200 रुपए किलो और आलू के भाव 25 रुपए किलो से घर का बजट बिगडने की पीड़ा के साथ डर भी झलकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों को सुनकर आए लोग कहते हैं कि वो अच्छे आदमी हैं। बोलते भी अच्छा हैं। लेकिन दो साल में अभी तक असम के लिए कुछ खास किया नहीं है। लोग यह भी कहते हैं कि कांग्रेस ने 15 साल राज किया, इसलिए भाजपा को भी देखना चाहिए, लेकिन कांग्रेस से दलबदल करके गए पूर्व मंत्री हेमंतो विश्वशर्मा और उनके साथियों को भाजपा में जो महत्व मिल रहा है,उससे भी लोग असहज हैं।
गुवाहाटी से लेकर बारपेटा या जोराहाट तक की यात्रा में जगह जगह लोगों से बात करने के बाद यह मिलीजुली तस्वीर उभरती है। मध्य असम के शहरी क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त साफ दिखाई देती है। लेकिन ऊपरी असम के गावों, चाय बागानों और सड़क के किनारे के कस्बों में भाजपा की बात करते करते लोग कांग्रेस की मजबूती की बात भी करने लगते हैं। इस बार असम विधानसभा चुनाव बेहद दिलचस्प हैं।
लोकसभा चुनावों की मोदी लहर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक प्रकल्पों और सहयोगी दलों के जरिए भाजपा असम के उन इलाकों और लोगों तक पहुंच गई है जिन्होंने 2014 तक कभी भाजपा को वोट नहीं दिया था। हर जगह या तो लोग भाजपा का पलड़ा भारी बताते हैं, या फिर कांग्रेस के साथ उसकी मजबूत टक्कर बताते हैं। यहां तक कि असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के उम्मीदवारों को भी लोग भाजपा का ही उम्मीदवार बताते हैं। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस हार जाएगी इसको लेकर भी लोग आश्वस्त नहीं हैं। उन्हें लगता है कि राज्य में कांग्रेस की जड़ें इतनी गहरी हैं उसे हराना अभी भी आसान नहीं हैं।
गुवाहाटी से निकलकर मध्य असम के मोरगांव जिले के जागीरोड पर होटल चला रहे आसू डे के मुताबिक यहां दस साल से कांग्रेस विधायक हैं, लेकिन इस बार उन्हें स्थानीय एक्यू जनजाति के नेता जिन्हें भाजपा ने टिकट दिया है, से कड़ी टक्कर मिल रही है। देवशाल, सितलखा होते हुए नौगांव जिले के सारगांव में मोहंतो कुमार पतोर और दिलीप गांवकर लोकसभा चुनाव जैसी हवा भाजपा के पक्ष में बताते हैं। पास खड़ी महिला काकली पतवारी भी दबी जबान से भाजपा को अपनी पसंद बताती हैं। लेकिन और ज्यादा बातचीत करने पर मोहंतो और दिलीप बताते हैं कि वह भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ता हैं और संघ द्वारा स्थापित एक पुस्तकालय से जुड़े हुए हैं।
आगे चलने पर उप सलमारा गांव की तस्वीर और ज्यादा दिलचस्प है। एक मृतक के श्राद्ध कार्यक्रम में जमा लोग पहले भाजपा को मजबूत बताते हैं। फिर युवा छात्रा रूबी डेका कांग्रेस का जोर बताने लगती हैं। वह इसके कारण भी गिनाती हैं। पास में खड़े कारपेंटर का काम करने वाले दिव्य ज्योति कहते हैं लंका में जो गया वो रावण हो जाता है। 200 रुपए किलो दाल और 25 रुपए किलो आलू खरीदकर खाने की ताकत गरीबों में कहां है। पेशे से शिक्षक स्मृति रेखा डेका हमें देखकर नजदीक आती हैं और कहती हैं केंद्र में भाजपा की सरकार है,इसलिए राज्य में भी अगर बनती है तो शायद कुछ फायदा हो सकता है।
पूर्व सैनिक प्रवीन चंद्र राय और सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी पी.के.डेका की भी यही राय है कि 15 साल तक कांग्रेस को देख चुके हैं।अब भाजपा को भी मौका मिलना चाहिए। लेकिन अनुसूचित जाति से आने वाले संजय कुमार प्रतिवाद करते हैं कि मोदी सिर्फ बोलते हैं करते कुछ नहीं। लोकसभा चुनावों में किया गया एक भी वादा पूरा नहीं हुआ। पास खड़े रामा प्रसाद उनसे सहमति जताते हैं। अचानक महिलाओं का एक समूह आता है और जो कांग्रेस के पक्ष में राय देता है। लीना डेका और हरिनाथ बरुआ कहते हैं कि गोगोई सरकार में जो गलत लोग थे वो भाजपा में चले गए हैं। तब फिर भाजपा केसाथ जाने का क्या फायदा। जोरहाट तक जहां भी लोगों से बात होती है, ऐसी ही मिली जुली प्रतिक्रिया मिलती है।