गमोसा कार्ड खेलकर राहुल गांधी ने दिया संदेश
भाजपा जहां सीएए, एनआरसी का रौब दिखा रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी के प्रभारी महासचिव जितेन्द्र सिंह ने राज्य में रणनीतिक स्तर पर बड़ा बदलाव किया। उन्होंने पार्टी के सर्वमान्य नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गगोई के निधन के बाद सबसे पहला काम कई धड़े में बंटे नेताओं को एकजुट किया। सबको एक दूसरे से तालमेल बनाकर संवाद, मीडिया या मंच से संवाद का संदेश और न मानने पर कार्रवाई की हिदायत भी दे दी।
सहयोगी अनिरुद्ध सिंह, विकास कुमार उपाध्याय, पृथ्वीराज साठे, हरिपाल रावत, और संजय चौधरी का सहयोग लेकर सांसद गौरव गोगोई, प्रद्युत बारदोलोई, देवव्रत सैकिया, रिपुन बोरा, सुष्मिता देव, रकीबुल हुसैन को एक वेवलेंथ पर ले आए। मसलन अभी तक असम में सुष्मिता देव कभी बराक घाटी से बाहर पार्टी गतिविधियों में रुचि नहीं लेती थी। इसी तरह से अपर और लोअर असम के नेताओं का हाल था, लेकिन जितेन्द्र सिंह ने इस अवरोध को ही खत्म कर दिया।
कांग्रेस महासचिव ने सभी प्रदेश स्तर के कांग्रेस नेताओं को पूरे असम में हर जगह जाकर पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी से जोड़ दिया है। राजनीतिक संदेश देने के लिए कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष को उसी शिवसागर में ले गए, जहां पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दौरा कर चुके थे। यह एक बड़ा दांव था। असम कांग्रेस के सभी नेताओं को राहुल गांधी के साथ कंधे पर गमोसा (गमछा) डालकर खड़ा कर दिया गया है।
गमोसा (सफेद रंग का लाल बॉर्डर वाला तौलिया) असम की पहचान से जुड़ा है। पर सबके पास सीएए को क्रॉस करता हुआ निशान भी है जिसका साफ मतलब है कि कांग्रेस सीएए का विरोध करेगी। राहुल गांधी ने भी घोषणा की कि कांग्रेस पार्टी असम में सीएए को लागू नहीं होने देगी। हालांकि राहुल गांधी के इस गमोसा अभियान को असम में रह रहे दूसरे वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। किसी मुद्दे पर बंगाल के तो किसी मुद्दे को दूसरे वर्ग के लोग अपने से जोड़ रहे हैं। पार्टी के नेता इसकी भी काट में जुटे हैं। हिन्दुत्व की लाइन भी ली जा रही है। ताकि सबको साधा जा सके।
दोनों दलों पर बढ़ गया है मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने का दबाव
हालांकि असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल हैं, लेकिन राज्य में भाजपा के पास सबसे कद्दावर नेता हिमंत बिस्व सरमा हैं। सरमा की महत्वाकांक्षा राज्य की बागडोर संभालने की है। इसी का दबाव बनाने की गरज से उन्होंने प्रधानमंत्री के दौरे से ठीक पहले चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी है। इससे भाजपा के खेमे में हलचल है। क्योंकि असम के लोगों का मानना है कि मुख्यमंत्री भले सर्बानंद सोनोवाल हैं, लेकिन सरकार चलाने में बड़ी भूमिका हिमंत बिस्व सरमा की रहती है। हिमंत कांग्रेस से भाजपा में गए हैं, इसलिए भाजपा के भीतर उन्हें चेहरा घोषित करने को लेकर कुछ संशय की स्थितियां हैं। देखना है कि आगे भाजपा के नेता इस बारे में क्या फैसला लेते हैं।
कांग्रेस की स्थिति तो और भी असमंजस भरी है। यहां कौन चेहरा होगा? कई मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं? गौरव गोगोई 38 साल के हैं। पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गगोई के बेटे हैं, समझदार हैं, लेकिन पार्टी चेहरा घोषित करने में संकोच कर रही है। फिलहाल वह घोषणा पत्र समिति के प्रमुख हैं। रिपुन बोरा समझदार, साफ सुथरी छवि के अनुभवी नेता हैं। प्रदेश चुनाव समिति के प्रमुख हैं। लेकिन जनता के बीच नेता वाली छवि नहीं है। प्रद्युत बारदोलोई, देवव्रत सैकिया भी मुख्यमंत्री का चेहरा हो सकते हैं। देवव्रत पूर्व मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया के बेटे हैं। महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव भी बड़ा चेहरा हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की दौड़ में नहीं गिनी जा रही हैं। ऐसे में देखना है कि कांग्रेस मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने या इसके विकल्प में क्या कदम उठाती है।
राहुल की सलाह :बदरुद्दीन जी जरा संभलकर चलिए
असम की राजनीति में एक बड़ा चेहरा एआईयूडीएफ के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल का भी है। सूत्र बताते हैं कि दो दिन पहले अजमल को राहुल गांधी ने नेक सलाह दी है। राहुल ने उनसे संभलकर चलने और सोच समझकर मुद्दा उठाने की सलाह दी है, ताकि अल्पसंख्यक वोट न खिसके और भाजपा को हिन्दुत्व के एजेंडे में वोटों का ध्रुवीकरण करने में सहूलियत भी न मिलने पाए। सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी की सलाह बदरुद्दीन अजमल को अच्छी लगी है। इसके साथ-साथ कांग्रेस पार्टी ने भाजपा को राजनीतिक पटखनी देने के लिए सीपीआई, सीपीआई(एम) और सीपीआई(एमएल) के साथ भी चुनाव पूर्व समझौता कर लिया है। माना जा रहा है कि 126 सीटों वाले असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 90 के करीब सीटों पर प्रत्याशी उतार सकती है और शेष 36 सीटें सहयोगियों को दे सकती हैं।
कांग्रेस को गठबंधन से फायदे की उम्मीद तो भाजपा को नए प्रयोग का जोखिम
भाजपा ने पिछला चुनाव असम गण परिषद (एजीपी), बीपीएफ के साथ मिलकर लड़ा था। 61 सीटें भाजपा को, 14 एजीपी और 12 बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को मिली थीं। बीपीएफ 12 पर ही चुनाव लड़ी और सभी सीटें जीत गई थी। इस बार बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा ने बीपीएफ की प्रतिद्वंदी यूनाइटेड पीपुल्स लिबरल पार्टी (यूपीपीएल) और गण सुरक्षा पार्टी से हाथ मिला लिया है। बीपीएफ ने भाजपा पर और भाजपा के नेताओं ने सरकार विरोधी लहर का ठीकरा बीपीएफ के नखरे पर फोड़ना शुरू कर दिया है। सोनोवाल सरकार में बीपीएफ के तीन मंत्री भी हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लग रहा है कि इसका उन्हें फायदा होगा। इसके अलावा असम जातीय परिषद (एजेपी) और रायजोर दल (आरडी) ने गठबंधन करके सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि इससे वोटों का बंटवारा होगा और इसका फायदा भी कांग्रेस को मिलेगा।
किसका कितना है दावा?
भाजपा के रणनीतिकारों का कहना है कि असम में सीएए, एनआरसी के बाद स्थिति में सुधार हुआ है। लोगों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कामकाज पर भरोसा है। सीएम सर्बानंद सोनोवाल और हिमंत बिस्व सरमा की जोड़ी इस बार पार्टी को 71 सीटें दिलाने में सफल रहेगी। एनडीए को 90-95 सीटें तक मिल सकती हैं।
दूसरी तरफ कांग्रेस के रणनीतिकारों का कहना है कि 126 सदस्यीय विधानसभा के लिए आज चुनाव हो जाएं तो पार्टी को 40-45 सीटें मिल सकती हैं। लेकिन कांग्रेस ने इधर तेजी से पत्ता खोलना शुरू किया है। समीकरण बनने लगे हैं और एक महीने बाद यही संख्या 55-60 तक पहुंच जाएगी। बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ को 16-18 सीट तक मिल सकती है। वाम दलों के खाते में भी 2-4 सीटें आ सकती हैं। इस तरह से विधानसभा चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को असम में 17-18 सीटें मिलने का अनुमान है। जबकि सरकार बनाने के लिए 64 सीटें चाहिए।