टुलू बांसफोड़ के पिता की 2006 में मृत्यु हो गई थी, तब वह मात्र 17 साल के थे।वह अस्पताल में एक आकस्मिक कार्यकर्ता के रूप में नौकरी पाने में सफल रहे थे। तब से, वह उम्मीद कर रहे हैं कि उसे एक स्थायी कार्यकर्ता के रूप में वर्गीकृत किया जाएगा।
कोरोना काल में घर नहीं जाते थे बांसफोड़
कोविड के मामलों में गिरावट के बाद अब बांसफोड़ फिर से अपने पुरानी ड्यूटी में वापस आ गए हैं। उन दिनों को याद करते हुए वो कहते हैं कि घर में बूढ़ी मां, पत्नी और एक बच्चा है, इसलिए मैं घर वापस नहीं जाता था ताकि वे लोग वो सुरक्षित रह सके। जब भी मरीज घबराते थे, तो मैं उन्हें खुश रखने का प्रयास करता था। दूर से ही बात कर के भरोसा देता था कि मैं उनकी सहायता के लिए हूं।
उनकी मां गीता बांसफोड़ ने कहा, ''मैं दिन भर रोती रहती थी, हम उसके बारे में चिंतित रहते थे। कई दिनों तक सो नहीं पाई थी। कई लोग हमें परेशान भी कर रहे थे क्योंकि हम गरीब हैं। टूलू की मां को भी 15 रुपये पेंशन के रूप में मिलता है।'
पति के काम को इनाम मिले
टुल्लू की पत्नी डिंपल कलिता चाहती है कि उसे काम पर स्थायी कर दिया जाए। डिंपल ने कहा, मेरे पति की महत्वपूर्ण सेवा को देखते हुए उन्हें स्थायी किया जाए। उनके सराहनीय कार्य के लिए उन्हें इनाम मिले। मैंने कई बार उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए भी कहा, लेकिन वह नौकरी करना चाहते हैं। उन्हें काफी लगाव है।