झारखंड मुक्ति मोर्चा असम विधानसभा चुनाव में 30 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। पार्टी आदिवासी और चाय बागान समुदाय को केंद्र में रखकर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। हेमंत सोरेन की लोकप्रियता पर भरोसा जताते हुए जेएमएम राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी गठबंधन के लिए भी तैयार है और चुनाव प्रचार की योजना बना रही है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा अब अपनी राजनीति को झारखंड से बाहर फैलाने की तैयारी में है। पार्टी ने असम विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है और 30 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बनाई है। इस कदम को जेएमएम के राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
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पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जेएमएम असम में करीब 31 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। अंतिम फैसला जल्द लिया जाएगा। पार्टी की नजर खास तौर पर वहां के चाय बागान मजदूरों और आदिवासी समुदाय पर है, जिनकी संख्या करीब 70 लाख बताई जाती है और जिनका संबंध झारखंड के इलाकों से रहा है।
क्या है जेएमएम की रणनीति?
पार्टी का मानना है कि असम में आदिवासी और चाय बागान से जुड़े लोगों की समस्याएं लंबे समय से अनदेखी रही हैं। JMM इन्हीं मुद्दों को उठाकर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। पार्टी नेताओं का कहना है कि इन समुदायों को मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है।
हेमंत सोरेन पर कितना भरोसा?
जेएमएम हेमंत सोरेन की लोकप्रियता पर दांव लगा रही है। पार्टी का कहना है कि वह देशभर में आदिवासी अधिकारों की आवाज बनकर उभरे हैं। सोरेन लगातार असम का दौरा कर रहे हैं और वहां के स्थानीय मुद्दों को उठा रहे हैं। उनकी पत्नी कल्पना सोरेन भी पार्टी के लिए अहम चेहरा बनकर उभरी हैं।
क्या गठबंधन की भी तैयारी है?
पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह असम में गठबंधन के लिए भी तैयार है। हेमंत सोरेन ने वहां के विपक्षी नेताओं से बातचीत भी की है। इसके अलावा पार्टी ने 20 स्टार प्रचारकों की सूची भी जारी की है, जो चुनाव प्रचार में हिस्सा लेंगे।
आदिवासी मुद्दों पर क्यों है फोकस?
जेएमएम का कहना है कि असम में चाय बागान से जुड़े आदिवासी समुदाय को अब तक उनका हक नहीं मिला है। सोरेन ने इन समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग भी उठाई है। पार्टी का दावा है कि वह इन मुद्दों को लेकर चुनाव मैदान में उतरेगी और आदिवासी पहचान व अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाएगी।