असम में 30 साल की नौकरी के बाद सेना से रिटायर्ड हो चुके एक सैनिक से अपनी नागरिकता साबित करने को कहा गया है। सनद रहे कि पिछले महीने ही एक विदेशी न्यायाधिकरण ने सेना के एक पूर्व जेसीओ को भी इसी आशय का नोटिस भेजा था।
सेना से
हवलदार पद से सेवानिवृत्त होने वाले महीरुद्दीन अहमद और उनकी पत्नी को विदेशी न्यायाधिकरण ने नोटिस भेज कर अपनी
नागरिकता का सबूत देने को कहा है। नोटिस में कहा गया है कि वे दोनों बिना किसी वैध कागजात के 25 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से सीमा पार कर भारत आए थे।
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अहमद ने पत्रकारों से कहा कि सेना में इतने लंबे अरसे तक नौकरी करने के बाद ऐसी नोटिस का मिलना बेहद दुखद व अपमानजनक है। यही नहीं उन्होंने यह भी दावा किया कि उनका जन्म साल 1964 में असम के बरपेटा जिले में हुआ था। उन्होंने सवाल किया कि भारत का नागिरक हुए बिना आखिरकार उनको सेना में नौकरी कैसे मिल गई थी।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले गुवाहाटी के एक सेवानिवृत्त जेसीओ मोहम्मद अजमल हक को भी ऐसी ही नोटिस भेजी गई थी। हालांकि बाद में पुलिस ने अपनी गलती मानते हुए नोटिस वापस ले ली थी। बता दें कि राज्य में संदिग्ध लोगों की नागरिकता की जांच के लिए विदेशी न्यायाधिकरणों का गठन किया गया था। अवैध घुसपैठ के बढ़ते मामलों के मद्देनजर ऐसे न्यायधिकरणों की संख्या साल 2015 में 36 से बढ़कर 100 कर दी गई थी।