सुप्रीम कोर्ट ने महारौली पुरातत्व पार्क में बने स्मारकों के पास नए निर्माण से जुड़ी याचिका पर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को पार्क में बने स्मारकों की निगरानी पर विचार करना चाहिए। इनमें कथित तौर पर 700 साल पुरानी आशिक अल्लाह दरगाह और सूफी संत बाबा फरीद की चिल्लागाह भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट से महरौली या संजय वन में दरगाह और आसपास के अन्य ऐतिहासिक स्मारकों को ध्वस्त करने या हटाने से रोकने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने 28 फरवरी को आदेश दिया था कि हमारी अनुमति के बिना क्षेत्र में मौजूदा संरचनाओं में कोई निर्माण, परिवर्धन या परिवर्तन नहीं किया जाए। पीठ ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के वकील से पूछा कि आप इसे पहले क्यों ध्वस्त करना चाहते हैं? इस पर डीडीए के वकील ने कहा कि प्राधिकरण दरगाह के खिलाफ नहीं है, लेकिन आसपास कई अन्य अनधिकृत संरचनाएं बनी हुई हैं। सवाल यह है कि इसका कितना हिस्सा संरक्षित स्मारक है और कितना हिस्सा अतिक्रमण है।
पीठ ने कहा कि आगे कोई निर्माण कार्य नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन स्मारक को संरक्षित किया जाना चाहिए। हमारा संबंध केवल स्मारक से है। पीठ ने कहा कि हम यह कहते हुए इन अपीलों का निपटारा करते हैं कि एएसआई को मरम्मत, नवीनीकरण के मामले में संबंधित स्मारकों की देखरेख पर विचार करना चाहिए।
याचिकाकर्ता का दावा- अतिक्रमण नहीं किया गया
मामले से अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि जिन स्मारकों को लेकर अपील की जा रही है, वह अतिक्रमण नहीं थे। स्मारक 12वीं शताब्दी से ही इस क्षेत्र में मौजूद हैं। अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि संरचनाओं को केंद्रीय संरक्षित स्मारक नहीं माना गया है, फिर भी एएसआई उनकी मरम्मत और रखरखाव की निगरानी कर सकता है। डीडीए के वकील ने दलील दी कि प्राधिकरण का संबंध केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों के अनुसार सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण करने वाले अनधिकृत ढांचों को गिराने से है। अपीलकर्ता ने पार्क के अंदर स्थित धार्मिक संरचनाओं को ध्वस्त होने से बचाने की मांग की।
एएसआई ने दिया था तर्क
इससे पहले एएसआई ने कहा था कि पुरातात्विक पार्क के अंदर स्थित दोनों संरचनाओं का धार्मिक महत्व है, क्योंकि मुस्लिम श्रद्धालु प्रतिदिन इन दरगाहों पर आते हैं। शेख शहीबुद्दीन (आशिक अल्लाह) की कब्र पर एक शिलालेख कहता है कि इसका निर्माण वर्ष 1317 ईस्वी में हुआ था। पुनर्स्थापना और संरक्षण के लिए किए गए संरचनात्मक बदलावों ने इस स्थान की ऐतिहासिकता को प्रभावित किया है। एएसआई ने दलील दी कि यह मकबरा पृथ्वीराज चौहान के गढ़ के करीब है और प्राचीन स्मारक व पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम के तहत 200 मीटर के नियामक क्षेत्र में आता है। इसके अनुसार, किसी भी मरम्मत, नवीनीकरण या निर्माण कार्य को सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति से ही किया जाना चाहिए।
क्या है मामला
शीर्ष अदालत जमीर अहमद जुमलाना की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दिल्ली के महरौली पुरातत्व पार्क के अंदर सदियों पुरानी धार्मिक संरचनाओं के संरक्षण की मांग की गई थी, जिसमें 13वीं शताब्दी की आशिक अल्लाह दरगाह (1317 ईस्वी) और बाबा फरीद की चिल्लागाह शामिल हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली विकास प्राधिकरण ने उनकी ऐतिहासिकता का आकलन किए बिना अतिक्रमण हटाने के नाम पर संरचनाओं को ध्वस्त करने की योजना बनाई है। जुमलाना ने 8 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था।