गहलोत के करीबी जयपुर के सूत्र का कहना है कि गहलोत लोकसभा चुनाव तक मुख्यमंत्री बनने के पक्ष में हैं। इसके पीछे गहलोत के समर्थकों का तर्क 2019 का लोकसभा चुनाव है। बताते हैं अगले कुछ महीने में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के दौरान राजस्थान में एक बार फिर भाजपा और कांग्रेस की प्रतिष्ठा दांव पर लगेगी। गहलोत समर्थकों का दावा है कि इस लड़ाई को सचिन पायलट के भरोसे नहीं जीता जा सकता। राजस्थान में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी सीटों पर जीत हासिल कर ली थी। गहलोत के समर्थकों का कहना है कि यदि सबकुछ ठीक रहा और विधानसभा चुनाव की तर्ज पर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव का चौसर बिछाया को 20 से अधिक सीटें कांग्रेस के पक्ष में आना तय है।
सचिन पायलट युवा हैं। केन्द्र सरकार में मंत्री रहे हैं। राजस्थान के गुर्जर समाज में अच्छी पकड़ रखते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से अच्छी निभती है। विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें अपने पिता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. राजेश पालट की छाया में ही देखा जाता था। वह राजेश पायलट की परंपरागत सीट से लोकसभा का चुनाव लड़कर भी जीते थे। एक तरह से कहा जाय तो सचिन पायलट दौसा क्षेत्र तक सिमटे हुए नेता थे, लेकिन पिछले डेढ़ सालों में उन्होंने राजस्थान की फिजां बदल डाली। पूरे राजस्थान का न केवल तूफानी दौरा किया, बल्कि हर समाज, वर्ग में पकड़ बनाई। वसुंधरा सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी की नब्ज टटोली। क्षेत्र से बाहर निकले और पूरे राजस्थान में फैल गए। राजस्थान में हुए लोकसभा और विधानसभा के उपचुनाव में पायलट ने अपनी मेहनत का एहसास भी कराया।
राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर मैदान तक जब सचिन पायलट घर-घर की घंटी बजाकर कांग्रेस की उम्मीद जगा रहे थे, तब राजनीति के चतुर खिलाड़ी मौन थे। माना जा रहा है कि गहलोत उस समय सचिन पायलट की कूवत आंक रहे थे। गहलोत को भरोसा था कि सचिन पायलट के लिए राजस्थान में कांग्रेस की जड़ों को हरा करना आसान नहीं होगा। राजस्थान की राजनीति के जानकार बताते हैं कि लेकिन सचिन इस इंतहान को आसानी से पास कर लिया। अपने कठिन और स्मार्ट मूव से पायलट ने राहुल गांधी का भी विश्वास जीत लिया। दूसरी तरफ गुजरात के प्रभारी के तौर पर गहलोत ने भी राहुल गांधी का विश्वास हासिल करने में सफलता पा ली। इसके बाद गहलोत सचिन के साथ तालमेल बनाने में जुट गए।
सचिन पायलट के सहयोगियों का कहना है कि राजस्थान में टिकट वितरण सही नहीं हुआ था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी टिकट वितरण को लेकर बीच में नाराज हो गए थे। बताते हैं यह गहलोत इफेक्ट था। राजस्थान में सभी बड़े नेताओं को मैदान में उतारना और उनकी उनके क्षेत्र में जिम्मेदारी तय कराने की सलाह भी गहलोत इफेक्ट थी। सचिन पायलट के करीबियों के अनुसार राजस्थान में सत्ता परिवर्तन तय थी। वसुंधरा राजे सरकार के विरुद्ध जबरदस्त विरोधी लहर थी और इसे कांग्रेस ने भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सूत्रों का कहना है कि यदि अशोक गहलोत इफेक्ट कुछ मामलों में प्रभावी न हुआ होता तो भाजपा को काफी कम सीटें मिलती। अशोक गहलोत के समर्थक इसे बिल्कुल उल्टा करके देखते हैं। उनका मानना है कि गहलोत का पूरे राज्य में हर जाति, वर्ग, संप्रदाय में प्रभाव है। अनुभव है। राजनीति में निपुण हैं। यदि गहलोत राजस्थान में समय और बड़े पैमाने पर योगदान न देते तो कांग्रेस का भाजपा को हरा पाना आसान नहीं था।