चुनाव आयोग को लेकर चल रहे विवाद के बीच एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन से लेकर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया तक कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब 2023 या 2024 में संबंधित विधेयक संसद में पेश किया गया था, तब उनकी पार्टी ने आशंका जताई थी कि अगर सरकार इसी तरह मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन करेगी तो जनता की नजर में आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।
ओवैसी ने कहा कि कानून मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को चयन प्रक्रिया में शामिल करने से प्रभावी तौर पर 2:1 का अनुपात बन जाता है। उन्होंने आयोग द्वारा लिए गए फैसलों को लेकर भी सवाल उठाया और पूछा कि आखिर कितने फैसले लिए गए और उन्हें किस बहुमत के आधार पर मंजूरी दी गई।
ओवैसी ने एनआरसी से की एसआईआर प्रक्रिया की तुलना
एआईएमआईएम सांसद ने कहा कि आयोग ने देशभर में कई फैसले लिए जाने और प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने की बात कही थी। इस संबंध में प्रेस नोट भी जारी किए गए थे। ओवैसी ने कहा कि उन्होंने संसद में एसआईआर को बैकडोर एनआरसी यानी पीछे के रास्ते से एनआरसी लागू करने जैसा बताया था।
ओवैसी ने कहा कि अगर आज तेलंगाना में कोई राजनीतिक दल जमीन पर सक्रिय रूप से काम कर रहा है तो वह एआईएमआईएम है। उन्होंने कहा कि तेलंगाना में न तो एनआरसी हुआ था और न ही स्थायी निवास प्रमाणपत्र जारी किए गए थे।
परिवार रजिस्टर को लेकर क्या बोले एआईएमआईएम सांसद?
उन्होंने चुनाव में इस्तेमाल होने वाले परिवार रजिस्टर को लेकर भी सवाल उठाया। ओवैसी के मुताबिक, चुनाव आयोग ने बिहार में सामने आई समस्याओं का हवाला देते हुए परिवार रजिस्टर को खारिज कर दिया। उन्होंने पूछा कि ऐसी स्थिति में पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन कैसे संभाला जाएगा।
ओवैसी ने कहा कि लोगों से ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी करने को कहा जा रहा है, जबकि बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) को घर-घर जाकर नोटिस बांटने हैं। उन्होंने दिल्ली में करीब 40 लाख मामलों की प्रक्रिया का भी जिक्र करते हुए पूछा कि ऑनलाइन काम, घर-घर जाना और दस्तावेज जुटाने जैसी गतिविधियां एक साथ कैसे पूरी होंगी।
ओवैसी ने लगाए क्या आरोप?
उन्होंने कहा कि ये ऐसे काम हैं जिन्हें व्यावहारिक तौर पर पूरा करना बेहद मुश्किल है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में उठाए गए मुख्य सवाल का जवाब देने में सक्षम नहीं है। ओवैसी ने कहा कि वह शुरुआत से ही एसआईआर का विरोध करते रहे हैं। उनके मुताबिक, उन्हें लगता है कि एसआईआर को लेकर लिया गया फैसला गलत था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाने चाहिए थे। ओवैसी ने आयोग से देश को यह बताने की मांग की कि उसके फैसले किस तरह के बहुमत के आधार पर लिए गए। उन्होंने कहा कि आयोग को यह भी बताना था कि कितने फैसले बहुमत से लिए गए। ओवैसी ने कहा कि चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने असहमति वाले नोट दिए हैं। ऐसे में अगर फैसले बहुमत से नहीं लिए गए तो उनकी वैधता का सवाल उठता है।
एसआईआर से देश की गरीबों पर पड़ा क्या बोझ?
ओवैसी ने कहा कि एसआईआर के कारण देश के गरीब लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है। दस्तावेजों की तलाश में उन्हें जगह-जगह भटकना पड़ रहा है, जिससे उनकी गरिमा प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि गरीबों पर इतना बड़ा बोझ डाल दिया गया है कि इसे कैसे संभाला जाएगा, यह समझना मुश्किल है।
उन्होंने भाजपा सरकार से उन लोगों को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की, जिनके नाम अंतिम एसआईआर में शामिल नहीं हुए। ओवैसी ने सवाल किया कि जिन लोगों के नाम अंतिम सूची से बाहर रह गए, उनके बच्चों, बेटों, बेटियों और पोते-पोतियों के नाम कैसे शामिल किए जाएंगे। उन्होंने पूछा कि अगर किसी व्यक्ति के दादा-दादी या माता-पिता के नाम ही सूची में नहीं हैं तो अगली पीढ़ी अपने वंश का मिलान किसके आधार पर कराएगी।