फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब विदेश मंत्री के रूप में अटलजी बोले- भारत ने सदा ही हिंसा का विरोध किया है

Sat, 18 Aug 2018 01:36 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली
विज्ञापन
3
विज्ञापन
अध्यक्ष महोदय, प्रतिनिधिगण,
विज्ञापन


भारतवर्ष में हाल में एक ऐतिहासिक और अहिंसात्मक क्रांति हुई है। गत मार्च में हुए चुनावों में भारतीय जनता ने मानव की दुर्दम्य आत्मशक्ति का परिचय दिया और एक स्वतंत्र तथा उन्मुक्त समाज में अपनी आस्था की पुष्टि की। 

उन्होंने लोकतंत्र को नष्ट करने के तामसी तथा निरंकुश शक्तियों के धूर्ततापूर्ण प्रयत्नों को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। हमारे देश की 60 करोड़ जनता के लिए मार्च की यह क्रांति स्पष्ट तथा दूरगामी महत्व रखती है, साथ ही समस्त संसार के स्वतंत्रता प्रेमी लोगों के लिए भी यह उतनी ही महत्वपूर्ण है।
विज्ञापन


हमारी जनता ने निर्भीक होकर उन मूल सिद्धांतों, जीवन मूल्यों तथा आकांक्षाओं को परिपुष्ट किया, जिन पर लगभग 30 वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र की आधारशिला रखी गई थी। भारत के लोगों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता और मूलभूत मानव अधिकार पुनः प्राप्त कर लिए हैं। मैं भारत की जनता की ओर से संयुक्त राष्ट्र के लिए शुभकामनाएं लाया हूं। 

महासभा के 32वें अधिवेशन के अवसर पर मैं संयुक्त राष्ट्र में भारत की जड़ आस्था को पुनः व्यक्त करना चाहता हूं। जनता सरकार की बागडोर संभाले केवल छह महीने हुए हैं, फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानवाधिकार पुनः प्रतिष्ठित हो गए हैं। ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं, जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा।

अध्यक्ष महोदय, 'वसुधैव कुटुंबकम' की परिकल्पना बहुत पुरानी है। हमें इस लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए कि किस प्रकार राष्ट्रों की यह महासभा मानवता के सामूहिक विवेक और इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली मानव की संसद का रूप ले सके। हमारी सदा से मान्यता रही है कि ईश्वर के अनेक रूप से हो सकते हैं। हर भारतवासी को, भले ही वह कहीं जन्मा हो या कोई आस्था रखता है, अपने उद्धार और मुक्ति का मार्ग ढूंढने की स्वतंत्रता रही है। 

साथ ही हमारे मनीषियों ने वैदिक युग से लेकर अब तक सदा ही हमें अपनी वाणी से मानवों के प्रति करुणा और सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है। गांधी जी ने इस तत्व का सार अपने प्रिय शब्द 'अंत्योदय' में व्यक्त किया है। मेरा विश्वास है कि हमारी राजनीति में निरंतर सर्वोच्च स्थान मनुष्य, उसके सुख और कल्याण तथा मानव की आधारभूत एकता को मिलना चाहिए। हमारे धर्मग्रंथों में सदैव यह संदेश निहित रहा है कि समस्त ब्रह्मांड और सृष्टि का मूल-व्यक्ति और उसका संपूर्ण विकास है।

जब भारत ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वातंत्र्य संग्राम छेड़ा, तब से विश्व एक लंबा रास्ता तय कर चुका है। भारत ने सदा ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में अनावश्यक रक्तपात और हिंसा का विरोध किया है। हम अहिंसा में आस्था रखते हैं और चाहते हैं कि विश्व के संघर्षों का समाधान शांति और समझौते के मार्ग से हो। 

पराधीनता के अंधकारपूर्ण काल में भी भारत कतिपय आधारभूत सिद्धांतों पर दृढ़ था।  यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं। आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए कहीं अधिक महत्व रखती है। अंततः हमारी सफलताएं और विफलताएं केवल एक ही मापदंड से मापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में प्रयत्नशील हैं।

अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है। भारत न तो आणविक शक्ति है और न बनना चाहता है। नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनर्घोषणा की है। हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय, जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा-वह है मानव का भविष्य। 
विज्ञापन


मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे।'

जय जगत!

-4 अक्तूबर, 1977 को जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के रूप में अटल जी द्वारा संयुक्त राष्ट्र में दिए गए भाषण के अंश।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें