खास बात यह है कि एनएसए अजीत डोभाल भी 24 जुलाई को कश्मीर का दौरा करने पहुंचे थे। उन्होंने अधिकारियों से बातचीत के अलावा कई जगहों का दौरा किया। लोगों ने यही समझा कि आतंकियों के खिलाफ कोई ऑपरेशनल रणनीति बनाई जा रही है। कश्मीर में गिने-चुने लोगों के अलावा किसी को मिशन का पता नहीं था।
आईबी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की इंटेलिजेंस विंग से हर इलाके की जानकारी जुटाई गई। कहां कितने स्कूल कालेज हैं, किस इलाके में पत्थराव की घटनाएं होती हैं और क्षेत्रों के प्रभावशाली व्यक्ति, हुर्रियत व अलगाववादी नेताओं की जानकारी, इस तरह की बहुत सी सूचनाएं इंटेलिजेंस एजेंसियों से मांगी गई थी।
जन प्रतिनिधियों के साथ प्रशासन की बैठकें हुईं, लेकिन अनुच्छेद 370 खत्म करने की भनक तब भी किसी को नहीं लग सकी। जैसे ही डोभाल दिल्ली लौटे, घाटी में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के दस हजार जवान तैनात कर दिए गए। अमरनाथ यात्रियों और पर्यटकों को जब यह कहा गया कि वे अपने घर लौट जाएं, तो सरकार में बैठे लोगों, राजनेताओं और आम जनता ने यह मान लिया कि अब आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ बातचीत कर अजीत डोभाल ने तत्कालीन राज्यपाल सतपाल मलिक एवं उनके सलाहकारों के साथ लंबी बैठक की। इसमें कई नए लोगों को शामिल किया गया। बीवीआर सुब्रमण्यम को जम्मू-कश्मीर का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। पूर्व आईपीएस के. विजय कुमार को भी अहम जिम्मेदारी दी गई।
डोभाल ने वहां की सिविल सोसायटी के कई लोगों से भी बातचीत की थी। मिशन पूरा होने के दौरान या उसके बाद नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर पाकिस्तानी आर्मी, आईएसआई और बॉर्डर एक्शन टीम की हरकत को कैसे मुंह तोड़ जवाब देना है, ये सब तैयारी पहले ही कर ली गई थी।
एनएसए के दौरे के एक सप्ताह बाद रॉ सेक्रेट्री सामंत गोयल भी दो दिन के लिए जम्मू-कश्मीर पहुंच गए। बॉर्डर के किस हिस्से पर और घाटी में कहां क्या हो सकता है, यह होमवर्क कर लिया गया। आतंकियों के छिपने के संभावित ठिकानों से लेकर पाकिस्तानी हरकत का पता लगाने के लिए बड़े पैमाने पर फ़ोन इंटरसेप्ट की मदद ली गई। आईबी चीफ अरविंद कुमार ने वहां की सामाजिक परिस्थितियों और आतंकवाद की घटनाओं बाबत एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट तैयार की थी।
केंद्र के विशेष प्रतिनिधि और आईबी के पूर्व चीफ दिनेश्वर शर्मा ने जम्मू-कश्मीर में विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर वहां के माहौल पर जानकारी हासिल की। डीजीपी दिलबाग सिंह को अजीत डोभाल का विश्वस्त माना जाता है, उन्होंने मिशन के बाद घटनाओं को रोकने में अहम भूमिका अदा की है।
पूर्व पुलिस अधिकारी फारुख खान को आईजी के पद से रिटायर होने के बाद राज्यपाल सत्यपाल मलिक का सलाहकार नियुक्त किया गया था। जम्मू-कश्मीर में किस जगह पर दंगा या पत्थरबाज हरकत कर सकते हैं, यह जानकारी इनके पास होती है। किस नेता को कब और कहां नजरबंद करना है, इसके लिए फारुख खान की मदद ली गई।