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अनुच्छेद 370: केंद्र की दलील, फैसला देश हित और जम्मू-कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए, जानें याचिकाकर्ता का तर्क

Wed, 06 Sep 2023 06:50 AM IST
गुलाम अहमद अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 निरस्त करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 16 दिनों तक दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मंगलवार को फैसला सुरक्षित रख लिया। दोनों पक्षों ने 370 हटाने के पक्ष व विरोध में सांविधानिक पहलुओं से लेकर ऐतिहासिक घटनाक्रमों पर चर्चा की। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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अनुच्छेद 370 को बेअसर करने के फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 16 दिनों तक चली सुनवाई के दौरान समर्थन और विरोध में अलग-अलग तर्क रखे गए। अनुच्छेद को निरस्त करने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की ओर से शीर्ष अदालत में दलील दी गई कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय विशेष परिस्थितियों में हुआ था। इसलिए उसे अलग दर्जा मिला। वहीं, केंद्र सरकार अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि उसने देश हित और जम्मू-कश्मीर के लोगों की भलाई के लिए निर्णय किया है।

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भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में कहा कि अन्य रियासतों की तरह जम्मू-कश्मीर ने भारत के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया था। राज्य की अलग संविधान सभा थी, जो 1957 में राज्य के लिए संविधान बनाने के साथ ही खत्म हो गई।

अनुच्छेद 370 को निरस्त करने का फैसला जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सहमति से ही हो सकता है, चूंकि संविधान सभा ही नहीं है, इसलिए इस अनुच्छेद को हटाया नहीं जा सकता। इसने स्थायी रूप ले लिया है। इसलिए, संसद के माध्यम से भारत सरकार की ओर से इस संविधान को निरस्त करने का फैसला कानूनी तौर पर गलत है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, गोपाल सुब्रमण्यम, जफर शाह जैसे कई वरिष्ठ वकीलों ने दलीलें रखीं।
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सरकार और संगठनों की दलीलें
केंद्र सरकार और उसके फैसले का समर्थन करने वाले हस्तक्षेप याचिका दाखिल करने वालों की तरफ से कहा गया कि पुरानी व्यवस्था में एक बड़ी संख्या को दूसरे नागरिकों जैसे अधिकार नहीं उपलब्ध थे। उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा था। वे संपत्ति भी नहीं खरीद सकते थे, मतदान भी नहीं कर सकते थे। दूसरे राज्य के लोग भी जम्मू-कश्मीर में संपत्ति नहीं खरीद सकते थे।

कई बिंदुओं पर याचिकाकर्ता से सहमत नहीं हुए जज
सुनवाई के दौरान कई ऐसे मौके आए जब सीजेआई समेत पीठ के सदस्य न्यायाधीश याचिकाकर्ता की दलों से सहमत नहीं नजर आए। याचिकाकर्ताओं की ओर कहा गया कि संविधान पीठ की सहमित के बिना अनुच्छेद 370 को खत्म नहीं किया जा सकता। इस पर पीठ ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा 1957 में खत्म हो गई थी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि सिर्फ इस वजह से 370 को स्थायी मान लिया जाए। सीजेआई ने एक टिप्पणी में कहा, यह सत्य है कि राज्य के कुछ विषयों पर संसद कानून नहीं बना सकता था, लेकिन इससे भारत के साथ जम्मू-कश्मीर के संबंध पर असर नहीं पड़ता।

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