एंटीरिटरोवायरल थेरेपी यानी एआरटी एड्स रोगियों के लिए वरदान साबित हो रही है। कांफ्र्रेंस में यहां आए दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने इलाज की इस थैरपी पर अपना भरोसा जताया। उनका कहना है कि इस दवा के अलावा एचआईवी मरीज के पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
संक्रमण का पता चलते ही इस दवा को लेना शुरू कर देना चाहिए। यह दवा वायरस को तो खत्म नहीं करती लेकिन एचआईवी ग्रस्त इंसान की जिंदगी आसान कर सकती है। बस शर्त यह है कि बीपी की तरह यह दवा हर रोज ली जाए।
पूरी दुनिया में लगभग 37 मिलियन लोग एचआईवी से ग्रस्त हैं। इनमें से सिर्फ 17 मिलियन लोगों को ही यह दवा मिल पा रही है। जबकि इस दवा पर प्रति मरीज सालाना खर्च सिर्फ 7000 रुपये है।
एआर ट्रीटमेंट, तीन दवाओं का ऐसा काकटेल है जो शरीर में एचआईवी वायरस को बढ़ने से रोकता है। एड्स मरीज के लिए यह बहुत राहत की बात है। अंधेरे में जैसे उम्मीद की एक किरण। पहले समझें, एआरटी काम कैसे करता है।
शरीर में दाखिल होने के बाद एचआईवी वायरस सबसे पहले खून में मिल जाता है। करीब छह हफ्ते खून की किसी जांच में ये पकड़ में नहीं आता। इसे वैज्ञानिक विंडो पीरियड कहते हैं। फिर ये वायरस खामोशी से कोशिका में दाखिल हो जाता है और उसी में अपना घर बना लेता है। थोड़े ही वक्त में यह वायरस डीएनए में दाखिल हो जाता है।
इसे वैज्ञानिकों ने एचआईवी डीएनए नाम दिया है। इस तरह संक्रमित कोशिका जब और कोशिकाएं बनाती है तो एचआईवी डीएनए सक्रिय हो जाता है। वह एचआईवी वायरस के लिए शरीर में काफी ज्यादा मात्रा में कच्चा माल तैयार कर देता है। और एचआईवी ग्रस्त मरीज का सीडी4 काउंट तेजी से गिरकर 200 सेल्स से भी नीचे चला जाता है।
गिरता हुआ सीडी4 काउंट रोग प्रतिरोधक क्षमता को बुरी तरह से नष्ट कर देता है। इस तरह मरीज की रोगों से लड़ने की क्षमता में गुणात्मक कमी आ जाती है। वह बहुत जल्दी-जल्दी सर्दी जुकाम, बुखार, टीवी जैसे रोगों से ग्रस्त होने लगता है। दिक्कत की बात है कि उस पर कोई अन्य दवा भी काम नहीं करती।
दवा के चमत्कारिक नतीजे
एंटीरिटरोवायरल थेरेपी के कई चमत्कारिक नतीजे सामने आए हैं। एचआईवी संक्रमित मरीज अगर पता चलते ही इस दवा को लेना शुरू कर दे तो हो सकता है उसके खून की जांच में इस वायरस की गिनती यानी वायरल लोड दिखे ही नहीं।
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वह एचआईवी से मुक्त हो गया। इससे यह जरूर होगा कि वह न केवल सामान्य जीवन आसानी से जी सकता है बल्कि उससे दूसरों को एचआईवी से संक्रमित होने का खतरा भी कम हो जाता है।