6 अक्तूबर, साल 1993 को लातुर में विनाशकारी भूकंप आया था। भूकंप के 6 दिनों बाद एक आर्मी अफसर ने जिस 18 महीने की मासूम को बचाया था, उससे दो दशक बाद मुलाकात की है। इस घटना को अब 25 साल हो चुके हैं। लेफ्टिनेंट कर्नल सुमित बक्शी ने बताया कि वह उस समय अपनी टीम के साथ बैठकर खाना खा रहे थे। वह और उनकी टीम भूकंप के बाद से ही मंगलौर गांव के लोगों को रेस्क्यू कर रही थी।
उतने ही वहां एक दंपत्ति आया और उन्होंने बक्शी से कहा कि उनकी बेटी भूकंप के बाद से मिल नहीं रही है। बक्शी को भी कम उम्मीद थी कि इतने भयानक भूकंप के बाद पता नहीं मासूम बची होगी या नहीं। बच्ची महज 18 महीने की थी। लेकिन तलाश करने के बाद उन्हें बच्ची अचेत अवस्था में मलबे से मिली। उसके ऊपर धूल पड़ी हुई थी और वह मलबे में दबी थी। बच्ची को बचाने के बाद उन्होंने उसे उसके माता पिता को सौंप दिया।
अब रविवार को बक्शी ने उसी बच्ची से मुलाकात की। उसका नाम प्रीया जवालगे है। वह एक विद्यालय में अध्यापिक है। घटना को 25 साल होने पर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। जहां अफसर और प्रीया ने मुलाकात की। बक्शी ने बताया कि जगह जगह लोगों के शव पड़े हुए थे। हर जगह मलबा था, शवों से बदबू भी आ रही थी। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई जीवित बचा होगा। जब बच्ची के माता पिता के आग्रह पर उन्होंने खुदाई की तो उन्हें प्रीया मिल गई।
अफसर ने आगे बताया कि जब उन्होंने मलबा हटाकर देखा तो वह आश्चर्य में थे कि बच्ची जीवित थी। उन्होंने फिर पत्थर हटाने शुरू किए और अपनी टीम को इस बारे में सूचना दी। इसके कुछ देर बाद ही मिट्टी के कारण भूस्खलन आ गया। लेकिन वह और बच्ची बाद में बच गए। बाद में उनके इस कार्य के लिए उन्हें आर्मी चीफ कमेंडेशन कार्ड से सम्मानित किया गया।
बक्शी करीब दो दशक से प्रीया से मिलना चाहते थे। बीते साल उन्होंने अपने परिवार के साथ प्रीया से मुलाकात भी की। वह कहते हैं कि उस मंजर को वह कभी नहीं भूल सकते। इस वक्त वह पुणे में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें प्रिया से एक बार फिर मिलकर बहुत खुशी हुई है। उनके पास उस समय की तस्वीरें भी हैं। जो उनके मिशन की यादें हैं। दोनों ही एक दूसरे से मिलने के लिए दो दशक से इंतजार कर रहे थे। बीते साल हुई मुलाकात भी दोनों के लिए बेहद खास थी।