सियासत और कूटनीति के अपने मायने हैं। हमारे जवान जिन कठिन परिस्थितियों में सीमा की सुरक्षा में जुटे रहते हैं और लगातार अपनी जान पर खेलकर भी आतंकियों से लोहा लेते हैं, उसे हम महज उनकी शहादत पर सलामी देकर किनारे नहीं कर सकते।
पिछले कुछ सालों में जब से आतंकी हमलों की खबरें आना तेज़ हुई हैं, उससे कहीं ज्यादा ये खबरें भी आ रही हैं कि हमारे जवान बड़ी संख्या में शहीद हो रहे हैं, उन्हें राजकीय सम्मान या सैनिक सम्मान के साथ सलामी दी जा रही है, उनके परिवार वाले किस तरह अकेले पड़ गए हैं और किस तरह सरकार उनकी मदद कर रही है।
अक्सर हमारे जवानों की मिसाल देते हुए उनकी शहादत को पाकिस्तान को चुनौती देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन न तो घुसपैठ रुक पा रही है, न आतंकी हमले और न ही शहादत का सिलसिला।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद पर होने वाली खोखली बहसों और इसे खत्म कर देने के दावों को कैसे सच माना जाए जब आपसे मुट्ठी भर घुसपैठिए और आतंकी रोके नहीं जाते और उससे ज्यादा आपके जवान शहीद हो जाते हैं।
बेशक ये गंभीर मामला है कि क्या हमारे जवान सिर्फ शहादत के लिए तैयार किए जाते हैं, क्या उनकी शहादत को सलाम करने और बदला लेने के दावे करने भर से इसका इलाज संभव है या फिर इस मर्ज़ का कोई कारगर तरीका ढूंढना चाहिए?