सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि मध्यस्थों के पास विवादों के निपटारे के लिए अपनी खुद की फीस निर्धारित करने के लिए बाध्यकारी और लागू करने योग्य आदेश जारी करने की शक्ति नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मध्यस्थ अपने पारिश्रमिक के संबंध में पार्टियों के खिलाफ अपने निजी दावे तय नहीं कर सकते हैं और फीस का एकतरफा निर्धारण पार्टी की स्वायत्तता के सिद्धांतों और निषेध के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण शक्तियों का प्रयोग करते हुए अदालत ने भारत में मध्यस्थता के संचालन के लिए कई दिशा-निर्देशों को अपनाने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने एक विवाद पर फैसला सुनाते समय मध्यस्थों द्वारा खुद के लिए फीस तय करने के मुद्दे पर तेल और प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड सहित कई याचिकाओं पर फैसला सुनाया।
पीठ ने कहा कि मध्यस्थों के पास अपनी फीस निर्धारित करने के लिए बाध्यकारी और लागू करने योग्य आदेश जारी करने की शक्ति नहीं है। फीस का एकतरफा निर्धारण पार्टी स्वायत्तता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, यानी मध्यस्थ अपना पारिश्रमिक तय नहीं कर सकते।
हालांकि, इसने कहा कि एक मध्यस्थ न्यायाधिकरण के पास मध्यस्थता अधिनियम की धारा 31 (8) और धारा 31 ए के संदर्भ में पार्टियों के बीच लागत (मध्यस्थों के शुल्क और व्यय सहित) को विभाजित करने का विवेक है और एक जमा (लागत पर अग्रिम) की भी मांग करता है। पीठ ने कहा कि अगर लागत या जमा तय करते समय मध्यस्थ न्यायाधिकरण मध्यस्थों की फीस (पक्षों और मध्यस्थों के बीच समझौते की अनुपस्थिति में) से संबंधित कोई निष्कर्ष निकालता है, तो इसे मध्यस्थों के पक्ष में लागू नहीं किया जा सकता है।