क्या पहले भी इन कंपनियों को किसी मामले में संसद की किसी कमेटी के सामने पेश होना पड़ा है?
इससे पहले संसद की आईटी मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने 2020 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक रिपोर्ट पर स्पष्टीकरण मांगते हुए फेसबुक को भी तलब किया था। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि कैसे सोशल मीडिया कंपनी ने जानबूझकर एक नेता के नफरत भरे भाषणों पर आंखें मूंद ली थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक को डर था कि यदि उसने इस पर कोई कार्रवाई की तो इससे भारत में फर्म के व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंच सकता है, जो इसका सबसे बड़ा बाजार है। पिछले साल भी ट्विटर और फेसबुक को सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति के सामने पेश होना पड़ा था।सोशल मीडिया पर लोगों के अधिकारों की सुरक्षा कैसे की जाए और इन प्लेटफॉर्म्स का गलत इस्तेमाल कैसे रोका जाए, इन विषयों पर समिति ने दोनों कंपनियों के अधिकारियों से बात की थी।
बीते मार्च में भी सूचना प्रौद्योगिकी मामलों की स्थायी समिति के सामने फेसबुक की पेशी हुई थी। इस पेशी में फेसबुक के अधिकारियों को राजनीतिक तौर पर पक्षपात करने वाले एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करने के आरोपों का जवाब देना पड़ा था। फेसबुक पर एक पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए तकनीक का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप था। इसके साथ ही नफरत फैलाने वाले कंटेंट को बढ़ावा देने के आरोपों पर भी फेसबुक के अधिकारियों को सफाई देनी पड़ी थी।
क्या इन टेक कंपनियों को किसी अन्य देश में भी इस तरह पेश होना पड़ा है?
पिछले साल भी फेसबुक, ट्विटर और गूगल के सीईओ को अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश होना पड़ा था। उस वक्त इन कंपनियों पर 6 जनवरी को हुई कैपिटल दंगों के दौरान गलत सूचना फैलाने का आरोप लगा था। 2019 में फेसबुक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग को अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश होना पड़ा था। उनकी कंपनी फेसबुक पर निजता, नफरत वाले संदेश और बाजार की असीम शक्ति के दुरुपयोग के आरोप लगे थे। जुकरबर्ग को निजता के उल्लंघन, घृणा फैलाने वाले या गलत जानकारी देने वाले संदेशों को हटाने से जुड़े सवालों के जवाब देने पड़े थे। 2018 में कैंब्रिज एनालिटिका डेटा लीक मामले में भी जुकरबर्ग को अमेरिकी कांग्रेस ने तलब किया था।