फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bombay HC: हाईकोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से किया इनकार, असहमति को लेकर की ये अहम टिप्पणी

Fri, 14 Apr 2023 03:42 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई

सार

अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि प्रोफेसर ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के बारे में स्टेट्स मैसेज बहुत ही लापरवाह तरीके से पोस्ट किया है।
 
विज्ञापन
बंबई उच्च न्यायालय - फोटो : सोशल मीडिया
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बंबई उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 370 पर व्हाट्सएप स्टेटस डालने के लिए एक प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि संवेदनशील मामलों में कोई भी आलोचनात्मक या असहमतिपूर्ण विचार, जो लोगों के विभिन्न समूहों की भावनाओं को उत्तेजित करता है, स्थिति के उचित विश्लेषण और तर्क के समर्थन के बाद ही व्यक्त किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति एस बी शुक्रे और न्यायमूर्ति एम एम सथाये की खंडपीठ ने 10 अप्रैल के अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि प्रोफेसर ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के बारे में स्टेट्स मैसेज बहुत ही लापरवाह तरीके से पोस्ट किया है।

विज्ञापन
Trending Videos

आईपीसी की धारा 153 रद्द करने की थी मांग
अदालत ने जावेद अहमद हजाम (26 वर्षीय) द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। जावेद के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 153 ए (दुश्मनी को बढ़ावा देना) के तहत महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के हातकणंगले पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी दर्ज की गई  है। याचिका में इस प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई थी।
 

व्हाट्सएप स्टेट्स में लिखा- 5 अगस्त, काला दिवस'
मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले के रहने वाले जावेद कोल्हापुर के एक कॉलेज में प्रोफेसर थे। हजाम के खिलाफ आरोप है कि 13 से 15 अगस्त, 2022 के बीच उन्होंने अपने व्हाट्सएप पर '5 अगस्त, काला दिवस, जम्मू और कश्मीर' वाला एक स्टेटस डाला था, जिसमें नीचे एक मैसेज में लिखा था कि 'अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया, इससे हम खुश नहीं हैं' और '14 अगस्त को पाकिस्तान को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं'।
 

प्रोफेसर ने अपनी याचिका में क्या कहा था?
जावेद ने अपनी याचिका में कहा कि उन्होंने ऐसा कोई संदेश प्रसारित नहीं किया है जो शत्रुता को बढ़ावा देता हो या धर्मों के बीच वैमनस्य या घृणा की भावना लाता हो। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने केवल अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर अपना विचार रखा था। हालांकि, पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 370 पर पहला स्टेटस मैसेज आईपीसी की धारा 153 ए के तहत अपराध है, लेकिन पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर दूसरा स्टेटस मैसेज अपराध नहीं है।
 

अदालत ने कहा- बिना विश्लेषण के आलोचना की
अदालत ने अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता (जावेद) द्वारा व्हाट्सएप पर पोस्ट किया गया पहला संदेश बिना कोई कारण बताए और संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए कदम का कोई आलोचनात्मक विश्लेषण किए बिना है। उच्च न्यायालय ने कहा, हमारे विचार से इस संदेश में भारत में लोगों के विभिन्न समूहों की भावनाओं के साथ खेलने की प्रवृत्ति है, क्योंकि भारत में जम्मू कश्मीर की स्थिति के बारे में विपरीत प्रकृति की मजबूत भावनाएं हैं और इसलिए ऐसे क्षेत्र में सावधानी से चलना होगा।
 
विज्ञापन

हाईकोर्ट ने कहा- हर शब्द अच्छी स्थिति में बनाए रखना जरूरी
अदालत ने कहा कि अगर कोई आलोचना की जानी है, तो यह स्थिति के सभी फायदे और नुकसान के मूल्यांकन के बाद होनी चाहिए और तर्क द्वारा समर्थित होनी चाहिए। अदालत ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां अनुच्छेद 19 के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रकृति में मौलिक अधिकार है, आलोचना का हर शब्द और असहमति का हर दृष्टिकोण लोकतंत्र को अच्छी स्थिति में बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

पीठ ने कहा, कम से कम संवेदनशील मामलों में किसी भी आलोचनात्मक शब्द या असहमति के विचार को पूरी स्थिति के उचित विश्लेषण के बाद व्यक्त किया जाना चाहिए और उन कारणों को प्रदान करना चाहिए जिनके लिए आलोचना या असहमति की गई है।
 
और भी पढ़ें....
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें