नीति आयोग ने लोगों को आने वाले दिनों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस(रोगाणुरोधी प्रतिरोध) से खतरे को लेकर सावधान किया है। नीति आयोग ने कहा कि समय रहते अगर इसपर काबू नहीं पाया गया तो यह बेहद खतरनाक हो सकता है।
एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस यानी एएमआर एक ऐसी क्षमता होती है जिसके जरिए सूक्ष्मजीवी पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर होना बंद हो जाता है। ऐसा होने पर अगर कभी व्यक्ति गंभीर तौर पर बीमार होता है और शरीर के भीतर पनप रहे अवांछित सूक्ष्मजीवी दवा से ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं तो व्यक्ति का ठीक होना बेहद मुश्किल हो जाता है।
आयोग के रिपोर्ट के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का बिना डॉक्टर के पर्चे के लोगों को देना और दवाई की जानकारी न रखने वाले लोगों की तरफ से ऐसी दवा दिए जाने और बिना एंटीबायोटिक की जरूरत हुए भी इनका इस्तेमाल बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
रिपोर्ट में इस तरफ भी इशारा किया गया है कि जानवरों के चारे में भी इनके इस्तेमाल से दवा का रेसिस्टेंस पैदा होता है। वहीं मुर्गी फार्म में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल से भी समस्याएं पैदा हो रही है। आयोग ने आशंका जाहिर की है कि ऐसी स्थिति में दुनियाभर में स्वास्थ्य इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।
खतरे पर काबू पाने के लिए भारत और ब्रिटेन साथ कर रहा है काम
भारत और ब्रिटेन एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) से निपटने के लिए पांच नई परियोजनाओं के साथ अपने मौजूदा वैज्ञानिक अनुसंधान सहयोग को और बढ़ाना चाहता है। उन्होंने कहा कि हमारा यह कदम एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया और जीन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
इससे आगे उन्होंने कहा कि ब्रिटेन (यूके) अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए यूके रिसर्च एंड इनोवेशन फंड से 40 लाख पाउंड का योगदान दे रहा है और भारत भी अपने स्वयं के संसाधनों से 40 लाख पाउंड सहयोग राशि के रूप में देगा। यानी दोनों देश कुल मिलाकर 80 लाख पाउंड इन परियोजनाओं पर खर्च करेंगे।