बरेली के 35 साल के धीरज पाठक सन् 2003 से ही जानवरों का जीवन बचाने में लगे हैं। उन्होंने इस सेवा को ही जिंदगी का मकसद बना लिया है। शहर में कहीं भी घायल जानवर पड़ा हो फोन करिए, धीरज तुरंत वहां हाजिर होते हैं। वे घायल जानवर को अपने शेल्टर होम ले जाते हैं जहां उसका इलाज किया जाता है।
बकौल धीरज बहुत पहले एक चुहिया अचानक जलेबी की चाशनी में गिर गई। संयोग से मां सुधा पाठक भी वहीं पर थीं। बोलीं- मर जाएगी ये, बचाओ इसे कैसे भी। धीरज ने चुहिया को चाशनी से निकाला, उसकी जान बचा ली। यहीं से धीरज जानवरों की जिंदगी बचाने में जुट गए। पिता होटल के व्यवसाय में थे।
मां की मौत के बाद धीरज को होटल का कारोबार संभालना था। मगर, किसी घायल जानवर की सूचना मिलते ही ये तुरंत वहां पहुंच जाते। उसे उठाकर लाते और खुद के पैसे से इलाज कराते। धीरे-धीरे यह हुआ कि समय नहीं दे पाने की वजह से होटल का उनका धंधा ठप हो गया। आमदनी के स्रोत बंद हो गए, लेकिन धीरज ने जानवरों की सेवा नहीं छोड़ी।
जानवरों की सेवा के लिए जीवन समर्पित कर चुके धीरज ने शादी न करने का फैसला किया है। उनके शेल्टर होम में 50 से 60 घायल जानवर हर समय मौजूद रहते हैं। तीन साल पहले कार की टक्कर से एक कुत्ते के पैर बेकार हो गए। धीरज ने उसका ऑपरेशन कराया। पैर खराब होने से अब वह चल नहीं पाता। धीरज के चार साथी उसकी प्रतिदिन सेवा करते हैं।