निर्माता संदीप रेड्डी वांगा के निर्देशन में बनी फिल्म "एनिमल" विवादों में है। विवाद फिल्म के कॉन्टेंट, स्टोरी, किरदार और हिंसा के दृश्यों को लेकर तो हैै ही बल्कि ही इसे स्त्री विरोधी फिल्म भी कहा जा रहा है।
अमर उजाला डॉट कॉम ने सोशल मीडिया के माध्यम से जब अपने पाठकों से इस फिल्म को लेकर प्रतिक्रिया मांगी तो हमें कई टिप्पणियां इस फिल्म को लेकर प्राप्त हुईं।
निर्माता संदीप रेड्डी वांगा के निर्देशन में बनी फिल्म "एनिमल" बॉक्स-ऑफिस पर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है। फिल्म को एक बड़ा तबका पसंद कर रहा है तो वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जिसने ना केवल फिल्म को नकार दिया है बल्कि इसकी रिलीज पर ही सवाल उठाए हैं।
विवाद फिल्म के कॉन्टेंट, स्टोरी, किरदार और हिंसा के दृश्यों को लेकर है। इसे स्त्री विरोधी फिल्म भी कहा जा रहा है। हाल ही में संसद के उच्च सदन राज्यसभा में छत्तीसगढ़ से कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने इस फिल्म की स्टोरी को स्त्री अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाली कहा है। वे कहती हैं कि फिल्म का ट्रीटमेंट और हिंसा के दृश्य शर्मनाक हैं। उन्होंने इसे युवाओं को गुमराह करने वाली फिल्म बताकर बॉलीवुड निर्देशकों व निर्माताओं पर सवाल उठाएं हैं।
बुद्धिजीवी, प्रोफेसर, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस फिल्म को सामंती और युवाओं को भटकाने वाली फिल्म कहा है। यही नहीं दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा फिल्म का रिलीज होना सेंसर बोर्ड की गलती तक बता रहा है। एक ओर देश में फिल्म एनिमल को पसंद करने वाला वर्ग है तो वहीं एक बड़ा तबका इसे नापसंद कर रहा है।
मेरी राय में, 'एनिमल' जैसी फिल्म भारत में हर रोज़ ना बनती है, और ना बनेगी। आने वाले दस सालों में, यह भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक मानी जाएगी। बेशक, 'एनिमल' में कुछ बातें सीखने लायक और कुछ आलोचनात्मक हैं। हालांकि मुझे महिला किरदारों और एक-तरफा राजनीति के चित्रण पर संकोच ज़रूर है, और मैं उसके पक्ष में नहीं हूं। मगर सिनेमा के एक समझदार दीवाने होने की हैसियत से, मैं फिर भी धन्यवाद करता हूं निर्देशक संदीप रेड्डी वंगा का, कि उन्होंने ऐसी फिल्म बनाई जो एक शोर-शराबे वाले ट्रीटमेंट के साथ ही सही, कई हद तक भारतीय समाज के दबे हुए कुछ तथ्यों को सामने लाती है।
मैं सामाजिक दृष्टिकोण से देखूं, तो इस फिल्म ने कई अनकही बातों पर पर्दाफ़ाश किया है। एक तरफ हम क्वेंटिन टैरेन्टीनो और मार्टिन स्कॉर्सेज़ी जैसे फिल्मकारों की फिल्मों और ओटीटी प्लैटफॉर्म के कार्यक्रमों में दिखाए जाने वाली हिंसा को कला का दर्जा देकर चलता कर देते हैं, और जब इसको कोई निर्देशक भारत में दिखाता है, तब वह कड़ी आलोचना का शिकार हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है, क्यूंकि भारत में बदलाव और ताज़गी शब्द अक्सर महज़ नाम के लिए ही ठीक होते हैं। मगर उनपर अमल करना शुरुआत में मुश्किल होता है। यह बात हमारी सिनेमा पर भी लागू होती है, जहां पर बदलाव शुरुआत में कभी-कभी जनता की 'अंतरात्मा' पर 'लांछन' लगा डालते हैं और 'एनिमल' इस बात का प्रमाण है।
बैकग्राउंड स्कोर और एक्शन के मिश्रण का बेहतरीन अनुभव शायद ही मैंने किसी हिंदी फिल्म में इतना बखूबी से किया है। 'अर्जन वेल्ली' मेरे नज़रिये में भारतीय सिनेमा के सबसे ख़ूबसूरत चित्रित (पिक्चराइज़्ड) गीतों में शुमार है, जो आपको अपने सामने एक लोक-कथा का एहसास दिलाती है। कलाकारों में, रश्मिका मंदना को छोड़कर, हर कलाकार ने बखूबी से काम किया है। शक्ति कपूर का किरदार दमदार ज़रूर था, मगर असली मज़ा तो बॉबी देओल के किरदार में था जो कुछ ना कहने पर भी, बहुत कुछ कह गया। वहीँ सौरभ सचदेव की कलाकारी में दिवगंत कलाकार सलीम ग़ौस की छवि दिखाई देती है।
यश मिश्रा, ग़ाज़ियाबाद
एनिमल फ़िल्म अपने नाम के अनुरूप ही नर को पशुत्व के रूप में परिलक्षित करती हुई दिखाई देती हैं और सबसे बड़ी विडंबना है कि यह फ़िल्म कामयाबी के नए-नए मापदंड स्थापित कर रही है। इस तरह की फ़िल्म को वयस्क फ़िल्म घोषित करने से ही समाज के प्रति फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों का कार्य समाप्त नहीं हो जाता क्योंकि सोशल मीडिया के ज़माने में क्या आप विचार कर सकते हैं कि बच्चों से यह फ़िल्म दूर रह सकती हैं।
इसका मीडिया के द्वारा इतना शोर कर दिया गया है कि बच्चों की जिज्ञासा बढ़ जाएगी और बच्चे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के माध्यम से इसको देखने का प्रयास करेंगे, जिसकी वजह से बालमन पर कितना ख़तरनाक प्रभाव पड़ेगा यह चिंताजनक विषय है जिस तरह से विद्यालय की कक्षा मे स्टेनगन लेकर जाना दिखाया गया है उससे बच्चों की मानसिक हालत पर घातक प्रभाव पड़ने निश्चित है। अतः मैं सरकार से और सेंसर बोर्ड से यह अनुरोध करता हूं कि हमारी संस्कृति को बचाने के लिए इस तरह की हिंसक फ़िल्म को आगे से प्रदर्शित होने न दिया जाए।
विवेकादित्य आलम्बायन
मैंने ये फिल्म देखी क्यूंकि इसकी जिस तरह की हाइप थी उसे देखकर मुझे एक पल को लगा कि फिल्म मे जरूर कुछ दिलचस्प है लेकिन मैं गलत था जिस तरह के हिंसक दृश्य इस फिल्म में दिखाए गए हैं कोई शक़ नहीं की वे तालिबानी विचारधारा को दर्शाते हैं। इस प्रकार की सिनेमा हमारे समाज के लिए बहुत ही चिंता का विषय है जहां एक तरफ हमारे समाज में महिलाओं को सम्मान दिया जाता है।
इस फिल्म में बिल्कुल उसके विपरित दिखाया गया है संक्षेप में कहूं तो ये फिल्म परिवार के साथ तो आप बिल्कुल भी नहीं देख सकते और जो लोग ऐसी फूहड़ सिनेमा को मनोरंजन मान रहे हैं तो उन्हें वास्तव में एक बार मंथन की आवश्यकता है कि ऐसी फ़िल्में हमे संदेश क्या देना चाहती हैं।
शिवम वशिष्ठ
एक नकारत्मक उत्तेजक फिल्म। इतनी सारी हत्याएं और नए-नए हथियारों से जो आम चलन में नहीं हैं। यह लोगों को इसे प्राप्त करने और और कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करेगा।
ब्रजेश कुमार
किसी भी उद्देश्य के लिए एक साधन के रूप में हिंसा का औचित्य उचित नहीं है। महात्मा गांधी ने कहा था, "साधन भी लक्ष्य के समान ही महत्वपूर्ण हैं", और गलत साधनों से लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कुछ भी उचित नहीं है। एनसीआरबी के अनुसार, 2022 के दौरान किशोरों के खिलाफ कुल 30,555 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से कई में उनके दोस्तों या परिवार के सदस्यों के खिलाफ चाकू, बंदूक और अन्य उपकरणों के माध्यम से हिंसा शामिल है।
उपरोक्त आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए, कोई भी निश्चित रूप से सिनेमाघरों में जो देखता है (हिंसा) उसके बीच एक संबंध स्थापित कर सकता है कि वह (हिंसा) के बारे में क्या सोचता है और वह क्या करता है। फिल्म एनिमल के संदर्भ में सेंसर बोर्ड की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो गई है; उसे समाज के विभिन्न वर्गों पर इसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए, एक फिल्म में कहानी के विषय, भूमिका और प्रतिनिधित्व के तरीके की पूरी तरह से और आलोचनात्मक रूप से जांच करनी चाहिए।
समकालीन भारत में फिल्में एक असामाजिक कोण पर आधारित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि 35 वर्ष से कम उम्र की 65% आबादी का होना और युवाओं को हिंसा और सांप्रदायिकता में शामिल करना 2045 तक जनसांख्यिकीय विविधता को पूरा करने के भारत के लक्ष्य को बाधित करेगा। हमारी सिनेमा नैतिकता को लोगों को सामाजिक एकजुटता और सद्भाव के साथ-साथ व्यक्तिगत मानसिक और शारीरिक कल्याण के लिए प्रेरित करना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्र-निर्माण होगा, जैसा कि हेनरी डेविड थोरो के 1849 के निबंध "सविनय अवज्ञा" से गांधी की प्रेरणा ने 1930 के दशक में भारत के लिए किया था।