पी305 पीड़ित ने बताया, ''मेरे अंदर यह भावना थी कि मैं जीवित रह सकता हूं। मैंने अपने साथियों को भी इसके लिए प्रेरित किया। मैंने उनसे कहा कि हमें जिंदा रहना होगा और अपने परिवार के पास वापस जाना होगा। मुझे भी नहीं पता कि मेरे अंदर उस समय यह शक्ति कहां से आई थी। मैं काफी संवेदनशील व्यक्ति हूं।''
अनिल वायचाल ने बताया कि 17 मई की रात दो बजे के करीब बार्ज चक्रवात ताउते की चपेट में आया। बार्ज जब डूब रहा था तो वायचाल के पास अपने साथियों संग समुद्र में कूदने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। वह अपने साथियों के साथ शाम पांच बजे समुद्र में कूद गए थे।
जितना बड़ा समूह, जिंदा रहने की उतनी ही अधिक संभावना
वायचाल ने बताया कि उन्होंने अपने साथियों से समूह में समुद्र में कूदने को कहा था। उनका मानना था कि जितना बड़ा समूह होगा, बचने की उम्मीद उतनी अधिक होगी। उन सभी ने जो लाइफ जैकेट पहन रखी थी, वो अंधेरे में चमकती थी। इसका मतलब था कि अगर समुद्र में समूह में वे लोग रहते तो बड़े स्तर पर आसमान से लाइफ जैकेट चमकती नजर आतीं। इससे बचावकर्मी उन तक पहुंच सकते थे, लेकिन खराब मौसम में समूह में रहना आसान नहीं था।
अनिल ने बताया कि हमने दो से तीन लोगों का समूह बनाया और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर समुद्र में साथ रहने लगे, लेकिन हम दूसरे समूहों को नहीं देख पा रहे थे। अगर वे दिखते भी थे तो अगले ही समय में वे गायब हो जाते थे। वहां का मौसम बहुत खराब था। उन्होंने बताया कि उस समय समुद्र में लहरें 8 मीटर तक ऊंची थीं। जैसे ही वे आती थीं हम अलग हो जाते थे। इसके बाद हम फिर समूह बनाते थे। इस 9 घंटे में मैं 3 से 4 समूहों के साथ था, लेकिन इसके बाद ऐसा समय आया, जब मैं बिलकुल अकेला हो गया और उस वक्त लगा कि अब नहीं बचूंगा। आखिरकार आईएनएस कोच्चि की टीम ने 17-18 मई की दरम्यानी रात 2 बजे बचा लिया और आज मैं परिवार के साथ हूं।