आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अल्पसंख्यक आयोग के प्रमुख ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से कहा है कि वह तीन तलाक के मसले पर अपना रुख बदले। आयोग ने यह भी दावा किया कि तीन तलाक का मसला ऐसा है, जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की मान्यता कमजोर पडे़गी और इससे समान नागरिक संहिता को लागू करने को मजबूती मिलेगी। दोनों राज्यों के मानवाधिकार आयोग के प्रमुख आबिद रसूल खान ने कहा कि आज की तारीख में मुस्लिम समुदाय के सामने यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है क्योंकि सही मायने में लाखों की संख्या में महिलाएं तलाक से पीड़ित है।
उनके आदमियों ने केवल तीन बार तलाक शब्द का इस्तेमाल कर उन्हें अलग कर दिया। खान ने कहा कि उन्होंने पर्सनल लॉ बोर्ड और जमियत-उलेमा-ए-हिंद को लिखा है कि पिछले तीन साल के उनके कार्यकाल में उन्होंने पाया है कि तमाम मुस्लिम महिलाएं उत्पीड़न, परित्याग, शारीरिक चोट, गुजारा भत्ता न मिलने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। उन्होंने कहा कि वह सचेत करना चाहेंगे कि यदि बोर्ड तीन तलाक पर जोर देता है तो सही मायने में वह हमारी लाखों बहनों के साथ अन्याय कर रहा है और इस तरह वह सुप्रीम कोर्ट को मजबूर करेगा कि वह इस कानून को खारिज करे जो मानवाधिकार का हनन करता हो।
उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसे देखते हुए धार्मिक कानूनों को मान्यता तो है लेकिन अगर उससे मानवाधिकार का हनन होता है तो अदालत उसे खारिज कर देगी। सती रोकथाम कानून 1987 और हाल में हाजी अली दरगाह मामले में बांबे हाईकोर्ट का फैसला इसका ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक के मसले पर भी ऐसा कदम संभव है। अगर ऐसा होता है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा।