Bishnu Pada Ray: अंडमान-निकोबार के सांसद बिष्णु पाड़ा रे ने 'स्थानीय प्रमाणपत्र' को कानूनी दर्जा देने के लिए गृहमंत्री अमित शाह से आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इसके वैधानिक आधार न होने पर इसे रद्द कर दिया था, जिससे स्थानीय युवाओं को नौकरियों पर बुरा असर हुआ। सांसद ने लद्दाख मॉडल की तर्ज पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए भी कानूनी व्यवस्था की मांग की है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सांसद बिष्णु पाड़ा रे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से 'स्थानीय प्रमाणपत्र' प्रणाली को कानूनी रूप देने का आग्रह किया किया है। गृह मंत्रालय ने 1984 में एक निर्देश के तहत 'स्थानीय प्रमाणपत्र' की प्रणाली शुरू की थी। यह प्रमाणपत्र सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा के लिए जरूरी दस्तावेजों में से एक था। लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार बनाम संजय पंत मामले में इस प्रणाली को खारिज कर दिया था, क्योंकि इसके लिए कोई वैधानिक आधार नहीं था। इससे द्वीपवासियों को नौकरी में मिलने वाले स्थानीय आरक्षण का अधिकार कानूनी रूप से समाप्त हो गया।
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पाडा रे के कार्यालय की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, 22 जुलाई को भेजे गए पत्र में सांसद ने अमित शाह को याद दिलाया कि सात फरवरी 2025 को भी उन्होंने इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने बताया कि स्थानीय प्रमाणपत्र की कानूनी मान्यता न होने से द्वीपों के दूरदराज और पिछड़े इलाकों के युवाओं के रोजगार पर बुरा असर पड़ रहा है।
सांसद ने 'लद्दाख निवासी प्रमाण पत्र आदेश, 2021' का हवाला देते हुए कहा कि जैसे लद्दाख में स्थानीय निवासियों को परिभाषित कर वहां के लोगों को नौकरियों में प्राथमिकता दी गई, वैसा ही कदम अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए भी उठाया जाना चाहिए।
सांसद ने कहा, मैं आपका ध्यान इस पर आकर्षित करना चाहता हूं कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए 'स्थानीय' की एक वैधानिक परिभाषा दी जाए और संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के तहत स्थानीय लोगों को नौकरी में आरक्षण या प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने आगे कहा, यह कदम द्वीप वासियों को राहत देगा और अंडमान-निकोबार को लद्दाख के समान स्तर पर लाएगा, जहां स्थानीय लोगों के रोजगार की रक्षा को प्राथमिकता दी गई है।