AMU: 59 साल से चला आ रहा एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का विवाद क्या है, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्या बदलेगा?
फैक्ट चेक डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवेंद्र तिवारी
Updated Fri, 08 Nov 2024 06:29 PM IST
सार
AMU Minority Status Row: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 57 साल पुराने एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले को 4:3 बहुमत से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि चूंकि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता। फैसले में कहा गया है कि एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे के मुद्दे को नियमित पीठ द्वारा तय किया जाना है।
देश की सर्वोच्च अदालत ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के दर्जे को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से फैसले में कहा है कि अल्पसंख्यक दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं खोया जाता कि संस्थान कानून के जरिए बनाया गया था। पीठ ने 4:3 बहुमत से निर्णय सुनाते हुए एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ के 1967 के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी कानून द्वारा बनी संस्था अल्पसंख्यक संस्था होने का दावा नहीं कर सकती। अदालत ने कहा है कि एएमयू अल्पसंख्यक दावे का फैसला इस आधार पर किया जाएगा कि इसे किसने स्थापित किया। एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं इसका फैसला अब एक नियमित पीठ तय करेगी।
1965 में यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक स्वरूप खत्म कर दिया गया था। 1967 में यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। तब से यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक का दर्जा पाने के लिए लड़ाई लड़ रही है।
आइये जानते हैं कि एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर क्या विवाद है? यह मामला अदालत में कैसे पहुंचा? याचिका में क्या मांग की गई है? अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है? 1967 का फैसला किया था जिसे खारिज कर दिया गया? अब मामले में आगे क्या होगा?
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एएमयू अल्पसंख्यक दर्जा मामला
- फोटो : AMAR UJALA
देश की सर्वोच्च अदालत ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के दर्जे को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से फैसले में कहा है कि अल्पसंख्यक दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं खोया जाता कि संस्थान कानून के जरिए बनाया गया था। पीठ ने 4:3 बहुमत से निर्णय सुनाते हुए एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ के 1967 के फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी कानून द्वारा बनी संस्था अल्पसंख्यक संस्था होने का दावा नहीं कर सकती। अदालत ने कहा है कि एएमयू अल्पसंख्यक दावे का फैसला इस आधार पर किया जाएगा कि इसे किसने स्थापित किया। एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान है या नहीं इसका फैसला अब एक नियमित पीठ तय करेगी।
1965 में यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक स्वरूप खत्म कर दिया गया था। 1967 में यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था। तब से यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक का दर्जा पाने के लिए लड़ाई लड़ रही है।
आइये जानते हैं कि एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर क्या विवाद है? यह मामला अदालत में कैसे पहुंचा? याचिका में क्या मांग की गई है? अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है? 1967 का फैसला किया था जिसे खारिज कर दिया गया? अब मामले में आगे क्या होगा?
पहले जानते हैं कि एएमयू क्या है?
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है, जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में स्थित है। यह एक आवासीय शैक्षणिक संस्थान के रूप में काम करता है। एएमयू की वेबसाइट के अनुसार, विश्वविद्यालय 1920 में स्थापित किया गया था। सर सैयद ने वर्ष 1875 में मदरसातुल की स्थापना की थी। अगले दो साल बाद यह मदरसा एमएओ कॉलेज बन गया। यही कॉलेज वर्ष 1920 में एएमयू के रूप में वजूद में आया। हालांकि, सर सैयद अहमद का 27 मार्च 1898 को निधन हो गया था। यूनिवर्सिटी अपने वजूद से लेकर आज तक सुर्खियों में रही जिसके केंद्र में एएमयू एक्ट भी रहा।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में 467.6 हेक्टेयर में फैले एएमयू में 300 से अधिक पाठ्यक्रम चलते हैं। इसमें 37,327 से अधिक छात्र, 1,686 शिक्षक और लगभग 5,610 गैर-शिक्षण कर्मचारी हैं। अधिकांश कर्मचारी और छात्र परिसर में ही रहते हैं।
एएमयू
- फोटो : संवाद
क्या है एएमयू एक्ट?
दरअसल, संस्थान की स्थापना अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अधिनियम, 1920 के तहत की गई थी। अधिनियम की धारा 23 के अनुसार, विश्वविद्यालय के न्यायालय, विश्वविद्यालय के शासी निकाय में केवल मुस्लिम व्यक्ति ही शामिल होने चाहिए। इसके बाद कालांतर में एएमयू एक्ट में कई बदलाव हुए। आजादी के बाद एएमयू के एक्ट में वर्ष 1951 में बदलाव किए गए थे। साल 1965 में यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक स्वरूप खत्म दिया गया। इसके बाद 1967 में यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। 1981 में पुनः अल्पसंख्यक स्वरूप बहाल हो गया। 2004 में केंद्र के पत्र से स्वरूप को लेकर विवाद शुरू हो गया। वर्ष 2004 में इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। वर्ष 2006 में हाईकोर्ट ने अल्पसंख्यक स्वरूप खारिज कर दिया। वर्ष 2006 में संस्थान ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थान होने का शपथ पत्र वापस ले लिया। वर्ष 2019 में संविधान पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने 1 फरवरी 2024 को फैसला सुरक्षित कर लिया, जिसका फैसला 8 नवंबर 2024 को आया है।
AMU
- फोटो : आधिकारिक वेबसाइट (@amu.ac.in.)
किन विषयों को लेकर विवाद हुआ?
एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर विवाद 1967 में प्रमुखता से उभरा। यह विवाद एएमयू अधिनियम 1920 में 1951 और 1965 में किए गए संशोधनों को मिलीं कानूनी चुनौतियों के कारण उपजा था। प्रमुख बदलावों में 'लॉर्ड रेक्टर' के स्थान पर 'विजिटर' की नियुक्ति शामिल थी, जो भारत के राष्ट्रपति होंगे।
इसके बाद दूसरा बदलाव गैर-मुस्लिमों को विश्वविद्यालय न्यायालय का हिस्सा बनने की अनुमति से जुड़ा था। विश्वविद्यालय न्यायालय में सदस्यता को केवल मुसलमानों तक सीमित करने वाले प्रावधानों को हटा दिया गया, जिससे गैर-मुस्लिमों को शामिल करने की अनुमति मिल गई।
जब सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती दी गई तो मुख्य रूप यह दावा किया गया कि एएमयू की स्थापना मुसलमानों ने की थी और इसलिए इसका प्रबंधन उनका ही अधिकार है। इसी बीच 1967 में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आया। 1967 के एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि चूंकि एएमयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता। इस मामले में न्यायालय ने माना था कि संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अल्पसंख्यक का दर्जा किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय को नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसकी स्थापना संसदीय कानून के जरिए की गई थी।
अदालत के फैसले में अहम बात यह थी कि एएमयू की स्थापना एक केंद्रीय अधिनियम के जरिए की गई थी, ताकि इसकी डिग्रियों को सरकारी मान्यता मिल सके, जो यह दर्शाता है कि अधिनियम केवल मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रयासों का नतीजा नहीं था। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि यह अधिनियम मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रयासों का परिणाम हो सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि 1920 के अधिनियम के तहत विश्वविद्यालय की स्थापना मुस्लिम अल्पसंख्यकों द्वारा की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या विवाद हुआ?
सर्वोच्च न्यायालय के 1967 के फैसले के कारण देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसके चलते 1981 में एक संशोधन पारित किया गया, जिसमें एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे की पुष्टि की गई। एएमयू को केंद्र सरकार द्वारा एएमयू अधिनियम 1981 के जरिए 'राष्ट्रीय महत्व के संस्थान' का दर्जा दिया गया था।
इसके बाद विवाद के केंद्र 2005 में एएमयू का एक फैसला बना। दरअसल, 2005 में एएमयू ने स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम में मुस्लिम अभ्यर्थियों के लिए 50% सीटें आरक्षित कर दी। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस आरक्षण को रद्द कर दिया और 1981 के अधिनियम को निरस्त कर दिया। अदालत ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ मामले के अनुसार, एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में योग्य नहीं है। 2006 में केंद्र सरकार की एक याचिका समेत आठ याचिकाओं ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। इसी बीच 2016 में केंद्र सरकार ने यह कहते हुए अपनी अपील वापस ले ली कि अल्पसंख्यक संस्थान की स्थापना धर्मनिरपेक्ष राज्य के सिद्धांतों के विपरीत है।
वहीं 2019 में तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने मामले को सात-न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया। सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पारदीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और सतीश चंद्र शर्मा वाली पीठ ने सात दिनों तक सुनवाई। पीठ के सामने विचार करने के लिए चार मुख्य पहलू थे। पहला प्रश्न था कि क्या कानून से बना और शासित विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक का दर्जा दावा कर सकता है। दूसरा सवाल एस अजीज बाशा बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट के 1967 के फैसले के औचित्य को लेकर था जिसने एएमयू की अल्पसंख्यक स्थिति को खारिज कर दिया। तीसरा प्रश्न एएमयू अधिनियम में 1981 के संशोधन की प्रकृति और औचित्य जांचने के लिए था जिसने बाशा में निर्णय के बाद विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया। चौथा सवाल 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस निर्णय को लेकर था जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया था कि कि एएमयू एक गैर-अल्पसंख्यक संस्थान होने के नाते मेडिकल पीजी पाठ्यक्रमों में मुस्लिम अभ्यर्थियों के लिए 50% सीटें आरक्षित नहीं कर सकता है। पीठ ने आखिरकार 1 फरवरी 2024 को फैसला सुरक्षित कर लिया, जिसे अब 8 नवंबर को सुनाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
अभी क्या फैसला आया है?
सर्वोच्च न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने शुक्रवार (8 नवंबर) को 4:3 बहुमत से फैसला सुनाया कि किसी शैक्षणिक संस्थान का अल्पसंख्यक स्वरूप सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हो जाएगा क्योंकि संस्था एक कानून के जरिए बनाई गई थी। सात सदस्यीय पीठ ने एस. अजीज बाशा बनाम भारत संघ के 1967 के फैसले को खारिज कर दिया जिसमें यह माना गया था कि एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा विश्वविद्यालय को विनियमित करने वाले संसदीय कानून के कारण खत्म हो गया था। न्यायालय ने कहा कि यह निर्धारित करने के लिए कि कोई संस्था अल्पसंख्यक संस्था है या नहीं, यह देखना होगा कि संस्था की स्थापना किसने की।
संस्थान का स्वरूप कैसे जांचा जाएगा, अदालत ने इस पर भी प्रकाश डाला। अदालत ने कहा, 'अदालत को संस्थान की उत्पत्ति पर विचार करना होगा और यह भी देखना होगा कि संस्थान की स्थापना के पीछे किसका दिमाग था। यह भी देखना होगा कि जमीन के लिए धन किसने जुटाया और क्या अल्पसंख्यक समुदाय ने इसमें मदद की।'
पीठ ने अपने फैसले में कहा, 'हमने माना है कि अल्पसंख्यक संस्थान होने के लिए उसे अल्पसंख्यक द्वारा ही स्थापित किया जाना चाहिए और यह जरूरी नहीं है कि अल्पसंख्यक ही उसका प्रशासन करें।'
एक अहम बिंदु के रूप में न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 30 संविधान के लागू होने से पहले अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित संस्थानों पर भी लागू होता है। दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का मौलिक अधिकार देता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने बहुमत से असहमति जताई।
संक्षेप में बहुमत का निर्णय समझें तो किसी शैक्षणिक संस्थान का अल्पसंख्यक दर्जा तीन बिंदुओं से प्रभावित नहीं होगा, जिनमें कानून और सरकारी विनियमन का अधिनियमन, स्थापना की तिथि और गैर-अल्पसंख्यक सदस्यों द्वारा प्रशासन।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
असहमति वाला फैसला क्या है?
असहमत न्यायाधीश सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि 1981 में दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को कैसे भेजा गया, जिसके कारण वर्तमान मामला सामने आया। कहा कि दो न्यायाधीशों वाली पीठ को पांच न्यायाधीशों वाली पीठ के फैसले की समीक्षा करने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति दत्ता ने भी इस पर आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति शर्मा ने भी कहा कि दो न्यायाधीश इस मामले को सीधे सात न्यायाधीशों के पास नहीं भेज सकते थे।
वहीं, गुण-दोष के आधार पर न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि कोई संस्था अल्पसंख्यक दर्जे का दावा तभी कर सकती है जब वह अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित हो। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, 'शैक्षणिक संस्थानों में विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। अल्पसंख्यकों के दर्जे के लिए, उसे अनुच्छेद 30 के स्थापना और प्रशासन दोनों पहलुओं को पूरा करना होगा। एएमयू इस पर खरा उतरता है या नहीं, इसका निर्णय नियमित पीठ द्वारा किया जाएगा।'
न्यायमूर्ति दत्ता ने स्पष्ट रूप से कहा कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है और यह अनुच्छेद 30 के अंतर्गत नहीं आ सकता। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त करने के लिए किसी संस्था की स्थापना न केवल अल्पसंख्यक द्वारा की जानी चाहिए, बल्कि अन्य संस्थाओं को बाहर रखते हुए अल्पसंख्यक द्वारा ही उसका प्रशासन भी किया जाना चाहिए।