आखिरकार अमित शाह पीएम नरेंद्र मोदी के लालकृष्ण आडवाणी बन ही गए। हालांकि इसके लिए शाह को संगठन में अपनी ताकत का लोहा मनवाते हुए इसके लिए 5 साल इंतजार करना पड़ा। बहरहाल गृह मंत्री बनने के बाद शाह पर सरकार के राष्ट्रवाद से जुड़े एजेंडे को अमली जामा पहनाने की जिम्मेदारी है।
अगर शाह राष्ट्रवादी मुद्दे अनुच्छेद 35 ए, अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन बिल, राम मंदिर और कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की गुत्थी सुलझा पाए तो उनका सियासी क्षितिज में छा जाना तय है। उपरोक्त सभी एजेंडा सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल है।
दरअसल शाह संगठन में अपनी अमिट छाप छोड़ने के बाद अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित करना चाहते थे। यही कारण है कि सरकार में शामिल होने की स्थिति में उनकी पहली पसंद गृह मंत्रालय थी।
चूंकि राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दे पर पार्टी और सरकार ने बड़े बड़े वादे किये हैं। ऐसे में इस दूसरे कार्यकाल में इन मुद्दों की सियासी अहमियत बेहद बढ़ गई है। हालांकि इन मुद्दों को अमलीजामा पहनाने के लिए शाह को राज्यसभा में बहुमत का इंतजार के साथ सहयोगी दलों को भी राजी करना होगा। गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन बिल, अनुच्छेद 35 ए और अनुच्छेद 370 पर पार्टी के सहयोगियों का रुख भाजपा से अलग है।
कश्मीरी पंडितों की घर वापसी से कर सकते हैं शुरुआत
शाह अपने इस अभियान की शुरुआत कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में वापसी से कर सकते हैं। पहले कार्यकाल में इस संबंध में सरकार महज रूपरेखा ही तैयार कर पाई थी। इसके साथ ही शाह अनुच्छेद 35 ए को सुलझाने केलिए आगे बढ़ सकते हैं।