दस-बीस रुपए में चटखारेदार कचौरी इस आंदोलन का स्वाद बढ़ा रही है। छाया में सुस्ता रहे किसान अखबार भी पढ़ रहे हैं। ये देखने के लिए कि इस देश के पढ़े-लिखे वर्ग को उनकी कितनी चिंता है, सरकार उनके बारे में क्या सोच रही है।
ट्रैक्टर किसान के ख़ास साथी हैं। इनके बिना उसका गुजारा नहीं चलता। सो वो ट्रैक्टर इस आंदोलन में भी अपनी भूमिका पूरी संजीदगी से निभा रहे हैं।
यहां किसानों को लाने से लेकर उनके अस्थायी आराम करने की जगह भी इन्हीं ट्रैक्टरों की ट्रालियों में है। खाना भी इन्हीं ट्रालियों में बन रहा है। किसान हों और उनका ख़ास साथी हुक्का न हो, यह कैसे हो सकता है। सो, कुछ किसान प्रदर्शन के मुख्य मंच से दूर छाया में हुक्का गुड़गुडा रहे हैं।
सफाई कर्मचारी पानी की थैलियों को एक जगह समेट रहे हैं। सबका आंदोलन अपनी जगह है, लेकिन अगर उनका स्वच्छता मिशन अधूरा रह गया तो सब किये-धरे पर पानी फिर जाएगा। उनका आंदोलन तो बापू के जमाने से देश को स्वच्छ रखने का ही है, सो वे आज भी उसे आगे बढ़ाने पर लगे हुए हैं।
आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती भी तो है। उनके जन्मदिन पर वे उनके सपने को पूरा करने की अपनी कोशिश कैसे छोड़ देते।