पिछली बार सीआरपीएफ के 42 कुत्तों ने संदिग्ध सामान की जाँच का ज़िम्मा सम्भाला था। ये कुत्ते करीब दो सौ किलोमीटर के रास्ते पर चलकर सुरक्षा बलों को रूट सुरक्षित होने की गारंटी देते हैं। खोजी कुत्ते न केवल जमीन में चार फुट नीचे तक दबी विस्फोटक सामग्री खोज निकालते हैं, बल्कि आसपास के इलाके में कोई भी संदिग्ध व्यक्ति अगर इनकी नजर में आ जाए तो बिना किसी देरी के वह सूचना सीआरपीएफ तक पहुँच जाती है।
सीआरपीएफ के मुताबिक, एक कुत्ता चार-पांच किलोमीटर का रास्ता तय कर यह बताता है कि आगे सब कुछ ठीक है या कोई खतरा है। खोजी कुत्ते की सूंघने की क्षमता इतनी ही होती है। चार किलोमीटर के बाद कुत्ते को विश्राम के लिए गाड़ी में बैठा दिया जाता है और दूसरा कुत्ता डयूटी संभाल लेता है।
अमरनाथ यात्रा के लिए जवाहर टनल से निकलने वाले दोनों रास्ते, पहलगाम और बालटाल के करीब दो सौ किलोमीटर लंबे रूट को सुरक्षा के लिहाज से क्लीयर करने की जिम्मेदारी इन्हीं खोजी कुत्तों पर है। प्लास्टिक बैग या टिफ़िन बॉक्स में रखे हैंड ग्रेनेड को खोज निकालने के लिए इन कुत्तों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। यात्रा के दौरान आर्मी और अर्धसैनिक बलों के निशानेबाज हेलीकॉप्टर से गश्त करेंगे।
भारत-बांग्लादेश और पाकिस्तान बॉर्डर पर घुसपैठ रोकने के लिए इजरायल की जिस तकनीक पर काम चल रहा है, अमरनाथ यात्रा के दौरान बतौर पायलट प्रोजेक्ट उसका इस्तेमाल किया जाएगा। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अपने गृहमंत्री के कार्यकाल में खुद इजरायल जाकर इस सिस्टम की कार्यप्रणाली देखकर आए थे।
असम के धुबरी जिले में सीआईबीएमएस की शुरुआत कर दी गई है।सीआईबीएमएस के तहत बॉर्डर इलेक्ट्रॉनिकली क्यूआरटी इंटरसेप्शन टेक्नोलॉजी के जरिए बॉर्डर की सुरक्षा को पुख्ता किया जाता है। अमरनाथ यात्रा के रूट को डाटा नेटवर्क पर काम करने वाली संचार प्रणाली यानी ओएफसी केबल्स, डीएमआर कम्युनिकेशन, दिन और रात निगरानी करने वाले कैमरों और घुसपैठ का पता लगाने वाली प्रणाली द्वारा कवर किया गया है।
ये आधुनिक उपकरण कंट्रोल रूम को लगातार फीडबैक प्रदान करते हैं।इस तकनीक में कैमरे व सेन्सर सिस्टम हर मौसम में 24 घंटे काम करते हैं। मानसून के दौरान आतंकी ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, ऐसे में ये कैमरे सुरक्षा बलों को पहाड़, नदी-नाले और जंगल में होने वाली आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करते हैं।