अमर उजाला का पहला अंक 18 अप्रैल 1948 को प्रकाशित हुआ था। आगरा से यह एक विनम्र किन्तु दृढ़ संकल्पों से भरी शुरुआत थी। इसके बाद आजाद भारत में 50 का दशक अपने साथ देश का नया संविधान लेकर आया। देश का नव निर्माण शुरू हो चुका था। 1950 में अमर उजाला में बिजली से चलने वाली मोनोटाइप मशीन आई, जो एक घंटे में ढाई सौ कापियां छापती थी। लेकिन इन सीमित संसाधनों में भी अमर उजाला ने हमेशा देश और देशवासियों की चिंता की। अमर उजाला आम आदमी, किसानों और मजदूरों के हितों पर केंद्रित अखबार था।
स्थापना से एक साल में ही अमर उजाला ने अपना राष्ट्रीय स्वरूप बना लिया था। अमर उजाला के प्रतिनिधि देशभर में फैले थे। वे आजादी की लड़ाई में तपे हुए पत्रकार थे। बिना किसी राग द्वेष के जैसा देखते वैसी रिपोर्ट करते।
सितंबर 1949 : पंडित नेहरू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भाषण दिया और कहा- "हिंदू राष्ट्र और हिंदू संस्कृति का नारा निरर्थक है।" अमर उजाला के संवाददाता ने मौके से लिखा- "छात्रों की एक आमसभा में पं. नेहरू ने दो घंटे भाषण दिया। मूसलाधार वर्षा में भी छात्र पं. नेहरू का भाषण सुनते रहे और भीगी जमीन पर बैठे रहे।" इस घटना से एक दिन पहले ही वाराणसी पहुंचे आरएसएस प्रमुख गोलवलकर के खिलाफ छात्र नारे लग रहे थे। छात्रों पर जमकर लाठीचार्ज हुआ। इतने तीव्र विरोध की आशंका गुरु गोलवलकर को भी नहीं थी। अमर उजाला ने 6 सितंबर 1949 के अंक में शीर्षक छापा-"काले झंडे देखते ही गुरुजी नेहरू सरकार के सहयोग की अपील कर गए।"
अंबाला जेल में गांधी जी के हत्यारों नाथू राम गोडसे और आप्टे को फांसी दी गई। उनके शवों को फंदे पर आधे घंटे तक लटकाए रखा गया। बाद में उनके शव जेलों में ही जला दिए गए। अमर उजाला ने लिखा- "जेल के सामने व शहर में कोई प्रदर्शन नहीं हुआ। उनके रिश्तेदारों ने अस्थियां मांगी लेकिन सरकार ने खुद ही उनकी अस्थियां नदी में प्रवाहित कर दीं।"
22 व 23 दिसंबर,1949 की दरमियानी रात अयोध्या में बाबरी मस्जिद में मूर्ति की स्थापना और पूजा शुरू होने का समाचार अमर उजाला में प्रकाशित हुआ-"खबर बिजली की तरह फैल गई और भोर होते ही जिलाधीश व पुलिस अधिकारी सदल घटनास्थल पर पहुंच गए। मूर्ति तो नहीं हटायी गई, पुजारी निकाल दिए गए। हथियारबंद पुलिस का जबरदस्त पहरा लगा दिया गया।"
1950 : पहली मोनोटाइप मशीन
आजाद भारत में 50 का दशक अपने साथ देश का नया संविधान लेकर आया। देश का नवनिर्माण शुरू हो चुका था। 1950 में अमर उजाला में बिजली से चलने वाली मोनोटाइप मशीन आई, जो एक घंटे में ढाई सौ कापियां छापती थी। लेकिन इन सीमित संसाधनों में भी अमर उजाला ने हमेशा देश और देशवासियों की चिंता की। अमर उजाला आम आदमी, किसानों और मजदूरों के हितों पर केंद्रित अखबार था। गणतंत्र दिवस की पहली सालगिरह पर उत्तर प्रदेश सरकार ने जमींदारी प्रथा खत्म कर दी। अमर उजाला ने 27 जनवरी 1951 को बैनर लीड छापी-"यू.पी. के किसान जमींदारों के खूनी पंजों से मुक्त।"
अमर उजाला ने राजनीतिक दबावों की परवाह कभी नहीं की। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर खबरें प्रकाशित कीं...
14 जनवरी, 1951 : अमर उजाला ने "आगरा में कांग्रेसी डाके व हत्या में पकड़े गये" बेबाक शीर्षक से खबर छापी। यह मुद्दा उत्तर प्रदेश विधान परिषद में पूर्व वित्तमंत्री पं. कृष्ण दत्त पालीवाल ने उठाया कि आगरा में डकैतों को कांग्रेसी खुल कर मदद दे रहे हैं। इसके जवाब में उप्र सरकार के तत्कालीन पुलिस मंत्री (बाद में प्रधानमंत्री बने) लालबहादुर शास्त्री को सदन में भरोसा देना पड़ा कि इन डकैत गिरोहों को कुचलने के लिए सरकार हर तरह के प्रयास कर रही है।
7 अक्तूबर, 1952 : अमर उजाला ने एक शीर्षक छापा- "सेठ और नरेशों की चालें, धन विदेशी बैंकों में जमा किया।" इस समाचार में अमर उजाला ने सत्तर साल पहले ही आशंका जता दी थी कि "धन विदेशी बैंकों में जमा किया रुपये के देश में आने की अब कोई आशा नहीं." दरअसल देश में लोकतंत्र की शुरुआत के साथ ही बड़े सेठों, राजा महाराजाओं ने अपना पैसा विदेशी बैंकों के खातों में जमा कराना शुरू कर दिया था।
...कठिन दौर में भी सच की आवाज
‘हल्लाबोल’ हुआ : अखबार की प्रतियां जलाई जाने लगीं...सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। दफ्तरों में छापे पड़ने लगे। कर्फ्यू के बहाने अमर उजाला के वितरण तक पर रोक लगा दी गई। उस कठिन दौर में भी अमर उजाला सच की आवाज बनकर घर-घर तक पहुंचा। सुदूर पहाड़ों पर भी वाहनों में छिपाकर अखबार के बंडल पहुंचाए जाने लगे थे।
उत्तराखंड आंदोलन पूरे उफान पर था। यूपी में तत्कालीन मुलायम सरकार इस आंदोलन को दबाना चाहती थी। 2 अक्तूबर, 1994 को तिराहा हत्याकांड हुआ। दिल्ली कूच कर रहे उत्तराखंड समर्थकों पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमें पन्द्रह आंदोलकारी शहीद हो गए। सरकार चाहती थी कि आंदोलन की कवरेज कुछ ऐसी हो कि घटनाएं दब जाएं। लेकिन अमर उजाला नहीं झुका। उसके पन्ने पुलिस के अत्याचार की दास्तानों से रंगे रहते थे।
इससे नाराज तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 12 अक्तूबर, 1994 को अमर उजाला के खिलाफ हल्लाबोल का सार्वजनिक एलान कर दिया। सपाई अखबार की प्रतियां जलाने लगे। सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। दफ्तरों में छापे पड़ने लगे। कर्फ्यू के बहाने अमर उजाला के वितरण तक पर रोक लगा दी गई। उस कठिन दौर में भी अमर उजाला सच की आवाज बनकर घर-घर तक पहुंचा।
सुदूर पहाड़ों पर भी वाहनों में छिपाकर अखबार के बंडल पहुंचाए जाने लगे थे। पाठक छिप-छिपाकर बंद दुकानों के शटर के नीचे से अखबार खरीद कर ले जाते थे। देखते-देखते विश्वसनीयता अमर उजाला का ट्रेड मार्क बन गई। जब तक अमर उजाला में खबर नहीं छपती, तब तक वह पुष्ट नहीं मानी जाती थी।