चाइनीज मांझा लोगों की जान पर ही नहीं देश के कारोबार पर भी भारी पड़ रहा है। दिल्ली में बीते 15 अगस्त को इसमें उलझ कर तीन लोगों की मौत हो गई और कई घायल हुए जबकि बुरी तरह जख्मी 800 पक्षियों को अस्पताल पहुंचाया गया। गाजियाबाद, रामपुर समेत अन्य जगहों पर भी इसमें उलझकर लोग जान गंवा चुके हैं। इसने देशभर में चर्चित रहे बरेली के दो सौ साल पुराने स्वदेशी मांझे के कारोबार को बुरी तरह प्रभावित किया है, नतीजतन बरेली का स्वदेशी मांझा कारोबार अंतिम सांसें गिन रहा है। 250 करोड़ रुपये का यह कारोबार अब महज सौ करोड़ पर सिमट गया है।
गौरतलब है कि सात साल पहले बनना शुरू हुए चाइनीज मांझे ने जब धीरे-धीरे स्वदेशी मांझे के गढ़ बरेली में दस्तक देना शुरू किया तो शुरुआती हादसों को लेकर स्थानीय कारोबारियों ने इसका विरोध करना शुरू किया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों तक बात पहुंची, प्रदर्शन हुए, लेकिन नतीजा कुछ न निकला। जब चाइनीज मांझे की वजह से बरेलवी मांझे का निर्यात घटने लगा तो यह प्रधानमंत्री तक के चुनावी भाषणों का हिस्सा भी बना। हालांकि इसके संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर कोई कदम नहीं उठाए गए। हाल यह है कि दिल्ली के बाजार में बरेलवी मांझे की आमद नाममात्र है। मेरठ, बनारस में भी बरेलवी मांझे का कारोबार लगभग खत्म सा हो गया है। इस कारोबार से जुड़े 10 हजार से अधिक लोगों में से ज्यादातर ने दूसरे धंधे की ओर रुख किया है।
कारोबारी इनाम अली बताते हैं कि पहले बरेली के बाकरगंज, नवदिया, स्वालेनगर, अशरफ खां छावनी समेत कई इलाकों में बनने वाले इस मांझे के दो-दो सौ कार्टून एक सीजन में निर्यात होते थे, लेकिन अब मात्र पांच से 10 कार्टून ही निर्यात होते हैं। बरेली का मांझा अब केवल लखनऊ, फ र्रु खाबाद, मेरठ, बनारस, कानपुर, औरंगाबाद, नागपुर, नासिक, अहमदाबाद, सूरत, जयपुर, पंजाब, मलेशिया, सउदी अरब, नेपाल के बाजार में जा रहा है। इनाम बताते हैं कि पहले के मुकाबले सिर्फ 20 फीसदी माल ही बरेली में तैयार हो रहा है।