सीएजी की लगभग 122 पेज वाली प्रिलिमिनरी रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है। सीएजी ने सवाल उठाया है कि जुलाई 2019 से लेकर दिसंबर 2020 तक फाइबर केबल के मेंटेनेंस और ऑपरेशन के लिए 'माइटी' द्वारा सीएससी को करोड़ों रुपये दे दिए गए। सीएजी के मुताबिक, एक फंड होता है। उसमें तमाम प्राइवेट प्लेयर को कॉन्ट्रिब्यूट करना पडता है। इस फंड को 'यूएसओएफ' यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लीगेशन फंड, कहा जाता है। यूएसओएफ के बारे में सीएजी लिखता है कि सीएससी को करोड़ों रुपये दे दिए गए। सीएससी कंपनी द्वारा विलंब से प्रोजेक्ट पूरा किया जाए तो या वह सही ढंग से काम न करे तो यूएसओएफ उस पर पेनल्टी भी नहीं लगा सकता। वजह, एग्रीमेंट में पेनल्टी का प्रावधान ही नहीं है।
बकौल पवन खेड़ा, ये सीएजी की टिप्पणी है। सेवा को लेकर कोई अनुबंध नहीं किया गया है। अगर किसी गांव या शहर से इंटरनेट न चलने की कोई शिकायत आ जाए तो वह शिकायत कब तक दूर होगी, इसकी कोई तय सीमा नहीं रखी गई है। ये त्रिपक्षीय करार मंत्रालय और सीएससी के बीच हुआ था।
दूरसंचार विभाग पिछले डेढ़ दो सालों से लगातार निजी कंपनियों को बिना टेंडर के ठेके दे रहा था। सीएससी, वाईफाई चौपाल सर्विस इंडिया प्राइवेट लि. के जरिए विभाग करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट के लिए यूएसओएफ फंड से पैसा लेता था। इसके बाद सीएससी वाईफाई चौपाल सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के जरिए उस पैसे को प्राइवेट कंपनियों को, वह भी बिना टेंडर किए बांट देता था।
पवन खेड़ा ने बताया कि जनवरी, 2021 तक यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लीगेशन फंड में 1,12,650 करोड़ रुपये जमा थे। कुछ ही दिन में 57,433 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया। बिहार का उदाहरण देते हुए कांग्रेस नेता ने कहा, सीएससी एक प्राइवेट कंपनी है। दूरसंचार विभाग के चौथे फ्लोर से ऑपरेट होती है। सितंबर 2020 में एक प्राइवेट कंपनी के साथ मंत्रालय, एसपीवी बनाता है। एसपीवी के जरिए प्रपोजल्स मंगाए जाते हैं और पैसे मंजूर कर दिए जाते हैं। सीएससी ने 13 सितंबर, 2020 को मंत्रालय को फाइबर टू होम, का एक प्रपोजल दिया। इसके तहत बिहार के हर गांव में वाई फाई कनेक्शन दिए जाएंगे। ये 630 करोड़ रुपए का प्रपोजल था। इसे पायलट प्रोजेक्ट भी नहीं कहा जा सकता। 19 सितंबर 2020 को डिजिटल कम्यूनिकेशन कमीशन ने इस प्रपोजल को मंजूरी दे दी। 15 अक्तूबर, 2020 को यूएसओएफ ने, नोमिनेशन बेसिस पर बिना किसी टेंडर के इस सीएससी को काम शुरू करने का लैटर दे दिया। खास बात है कि उस कंपनी के साथ कोई एग्रीमेंट भी नहीं हुआ था। 23 नवंबर, 2020 को सीएससी कंपनी ने एक ईमेल भेजा। इसमें यूएसओएफ को मोबिलाइजेशन एडवांस देने की बात की गई थी। प्रोजेक्ट राशि का 30 प्रतिशत मोबिलाइजेशन एडवांस होता है। कंपनी ने कोई एग्रीमेंट नहीं किया। उसके पास सिर्फ एक पत्र है, जिसमें लिखा है आप काम शुरू कीजिए। कंपनी ने इसके दम पर 189 करोड़ रुपये मोबिलाइजेशन एडवांस मांग लिया।
पवन खेड़ा ने कहा, हम प्रधानमंत्री से यह जानना चाहते हैं, सीएजी की ड्रॉफ्ट रिपोर्ट, प्रिलिमिनरी रिपोर्ट पर वे क्या कार्रवाई कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि एक मंत्री को मंत्रालय से बाहर कर देना, क्या उससे काम हो जाएगा। इस कंपनी ने भारतीय जनता पार्टी को किसी भी दिशा में, किसी भी तरीके से चंदा दिया है या नहीं दिया है, बताएं।