यूपी में सत्ता हासिल करने के लिए बेताब सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने दम पर फतह चाहते हैं। गठबंधन की राजनीति से वह फिलहाल दूर रहने की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं। पार्टियों की इस सोच को वैशाखी रहित राजनीति करने केतौर पर देखा जा रहा है।
सत्ताधारी समाजवादी पार्टी अब अकेले दम पर चुनाव जीतने की बात कर रही है। खुद सीएम अखिलेश यादव ने दो दिन पहले ही साफ कर दिया कि उन्हें गठबंधन की जरूरत नहीं हैं। विकास के दम पर समर्थन मिलेगा और फिर सरकार बनाएंगे। दरअसल सपा की कुछ दिन पहले चौधरी अजित सिंह के रालोद के साथ दोस्ती की बात चली थी। बिहार के सीएम नीतिश कुमार की कोशिश से बिहार की तर्ज पर यूपी में महागंठबघन केप्रयास भी हुए थे। लेकिन सपा की तरफ से दोनों ही स्तर पर हाथ खींच लिया गया।
बसपा शुरू से ही अकेला चलों की राह पर है। उसने अपने ज्यादातर उम्मीदवार भी घोषित कर दिए थे। कई माह पहले एक बार रालोद की तरफ से दोस्ती का प्रस्ताव देने की चर्चा थी। गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस के यूपी प्रभारी बनने के बाद भी चर्चा सामने आई थी कि कांग्रेस की तमन्ना बसपा से दोस्ती की है, लेकिन यह कोशिश कभी धरालत पर नहीं आई।
कांग्रेस की कामयाब रथयात्रा, राहुल और सोनिया गांधी के सफल आयोजन केबाद अब पार्टी ने अकेला चलो की राह पकड़ ली है। कांग्रेस प्रभारी गुलाम नबी आजाद और प्रदेशाध्यक्ष राजबब्बर का कहना है कि इस बार पार्टी किसी दल से नहीं बल्कि सीधे जनता से दोस्ती करेगी। पार्टी नंबर बढ़ाने के लिए नहीं सरकार बनाने के लिए काम करेगी। गौरतलब है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का रालोद से गठबंधन था। अब नहीं हैं।